श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय ७२७
| निरूपण इस समझसे किया गया है, कि महाभारतमें, और फलतः गीतामेंभी | भक्तिका जैसा वर्णन होना चाहिये, वैसा नहीं हुआ; उसमें यदि उक्त वचनोंके | समान औरभी कुछ बातें मिलें, तो कोई आश्चर्य नहीं। पर हमें तो गीताका | तात्पर्य देखना है; न कि भागवतका कथन। दोनोंका प्रयोजन और समयभी | भिन्न भिन्न हैं, इस कारण बात-बातमें उनकी एकवाक्यता करना उचित नहीं है। | अस्तु; कर्मयोगकी साम्य-बुद्धि प्राप्त करनेके लिये जिन साधनोंकी आवश्यकता | है, उनमेंसे पातंजलयोगके साधनोंका इस अध्यायमें निरूपण किया गया। ज्ञान | और भक्ति ये अन्य साधन है; और अगले अध्यायसे उनके निरूपणका आरंभ | होगा।] | इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें | ब्रह्मविद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके, | संवादमें, ध्यानयोग नामक छठा अध्याय समाप्त हुआ।