श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ | बातें छाँटा करते हैं । किंतु यह अर्थ निरे सांप्रदायिक आग्रहका है । ये टीकाकार | गीताके इस अर्थको नहीं चाहते, कि कर्म छोड़नेवाले ज्ञान-मार्गको गीता कम | दर्जेका समझती है । क्योंकि उससे उनके संप्रदायको गौणता प्राप्त होती है । | और इसीलिये “ कर्मयोगो विशिष्यते ” काभी (गीता ५. २ ) अर्थ उन्होंने | बदल दिया है । परंतु इसका पूरा पूरा विचार गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणमें | कर चुके हैं; अतः इस श्लोकका जो अर्थ हमने किया है, उसके विषयमें यहाँ | अधिक चर्चा नहीं करते । हमारे मतमें यह निर्विवाद है, कि गीताके अनुसार | कर्म-योगमार्गही सबमें श्रेष्ठ है । अब आगेके श्लोकमें बतलाते हैं, कि कर्म- | योगियोंमेंभी कौन-सा तारतम्य भाव देखना पड़ता है :- ] ( ४७ ) तथापि सब (कर्म-) योगियोंमेंभी मैं उसेही सबसे उत्तम युक्त अर्थात् उत्तम सिद्ध कर्मयोगी समझता हूँ, कि जो मुझमें अंतःकरण रख कर श्रद्धासे मुझको भजता है । | [ इस श्लोकका यह भावार्थ है, कि कर्मयोगमेंभी भक्तिका प्रेमपूरित | मेल हो जानेसे वह योगी भगवान्को अत्यन्त प्रिय हो जाता है। इसका यह अर्थ | नहीं है, कि निष्काम कर्मयोगकी अपेक्षाभी भक्ति श्रेष्ठ है । क्योंकि आगे बारहवें | अध्यायमें भगवान्नेही स्पष्ट कह दिया है, कि ध्यानकी अपेक्षा कर्मफलत्याग | श्रेष्ठ है ( गीता. १२. १२ ) । निष्काम कर्म और भक्तिके समुच्चयको श्रेष्ठ | कहना एक बात है, और सब निष्काम कर्मयोगको व्यर्थ कहकर, भक्तिहीको | श्रेष्ठ बतलाना दूसरी बात है । गीताका सिद्धान्त पहले ढंगका है और भागवत- | पुराणका पक्ष दूसरे ढंगका है । सब प्रकारके क्रियायोगको आत्मज्ञान-विघातक | निश्चितकर भागवत के ( भाग. १. ५. ३४ ) पहले और फिर अंतिम स्कंधमेंभी | कहा है :- | नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम् । | नैष्कर्म्य अर्थात् निष्काम कर्मभी ( भाग. ११. ३. ४६ ) बिना भगवद्भक्तिके | शोभा नहीं देता, वह व्यर्थ है ( भाग. १. ५. १२; १२. १२. ५२ ) इससे | व्यक्त होगा, कि भागवतकारका ध्यान केवल भक्तिकेही ऊपर होनेके कारण | वे विशेष प्रसंगपर भगवद्गीताकेभी आगे कैसी चौकड़ी भरते हैं। जिस पुराणका