भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 770

छठा अध्याय ७२५

§ § तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६ ॥

| मिल गई होगी; परंतु तात्त्विक दृष्टिसे देखनेपर, चलता है, कि उन्हेंभी यह | फल जन्मजन्मान्तरके पूर्वसंस्कारसेही मिला होगा । अस्तु; कर्मयोगका थोड़ा-सा | आचरण, यहाँतक कि जिज्ञासाभी इस रीतिसे सदैव कल्याणकारक है, इसके | अतिरिक्त अंतमें मोक्षप्राप्तिभी निःसंदेह इसीसे होती है; अतः अब भगवान् | अर्जुनसे कहते हैं, कि :- ] (४६) तपस्वी लोगोंकी अपेक्षा (कर्म-)योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानी पुरुषोंकी अपेक्षाभी श्रेष्ठ है, और कर्मकांडवालोंकी अपेक्षाभी श्रेष्ठ समझा जाता है; इसलिये हे अर्जुन ! तू योगी अर्थात् कर्मयोगी हो । | [ जंगलमें जाकर उपवास आदि शरीरको क्लेशदायक व्रतोंसे अथवा | हठयोगके साधनोंसे सिद्धि पानेवाले लोगोंको इस श्लोकमें तपस्वी कहा है, | और सामान्य रीतिसेभी इस शब्दका यही अर्थ है । " ज्ञानयोगेन सांख्यानां " | (गीता. ३. ३) में वर्णित, ज्ञानसे अर्थात् सांख्य-मार्गसे कर्म छोड़कर सिद्धि | प्राप्तकर लेनेवाले सांख्यनिष्ठ लोगोंको ज्ञानी माना है। इसी प्रकार गीता | २. ४२-४४ और ९. २०, २१ में वर्णित निरे काम्य-कर्म करनेवाले स्वर्गपरायण | कर्मठ मीमांसकोंको कर्मी कहा है। इन तीनों पंथोंमेसे प्रत्येक यही कहता है, | कि हमारे मार्गसेही सिद्धि मिलती है। किंतु अब गीताका यह कथन है, कि | तपस्वी हो, चाहे कर्मठ मीमांसक हो या ज्ञाननिष्ठ सांख्य हो, इनमें प्रत्येककी | अपेक्षा कर्मयोगी – अर्थात् कर्मयोग-मार्गभी – श्रेष्ठ है ! और पहले यही सिद्धान्त | "अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ०" (गीता. ३. ८), एवं "कर्मसंन्यासकी अपेक्षा | कर्मयोग विशेष०" (गीता ५. २) इत्यादि श्लोकोंमें वर्णित है (गीतार. | प्र. ११, पृ. ३०९, ३१०)। और तो क्या, तपस्वी, मीमांसक अथवा ज्ञान- | मार्गी इनमेंसे प्रत्येककी अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है, 'इसीलिये' पीछे जिस प्रकार | अर्जुनको उपदेश किया है, कि "योगस्थ होकर कर्म कर" (गीता २. ४८; | गीतार. प्र. ३, पृ. ५८), अथवा "योगका आश्रय करके खड़ा हो" (४. ४२), | उसी प्रकार यहाँभी फिर स्पष्ट उपदेश किया है, कि "तू (कर्म-)योगी | हो।" यदि इस प्रकार कर्मयोगको श्रेष्ठ न मानें, तो "तस्मात् तू योगी हो" | इस उपदेशका 'तस्मात् = इसलिये' पद निरर्थक हो जावेगा । किंतु संन्यास-मार्गके | टीकाकारोंको यह सिद्धान्त कैसे स्वीकृत हो सकता है? अतः उन लोगोंने 'ज्ञानी' | शब्दका अर्थ बदल दिया है, और वे कहते हैं, कि ज्ञानी शब्दका अर्थ केवल | शब्दज्ञानी है, अथवा वे लोग, कि जो सिर्फपुस्तकें पढ़कर ज्ञानकी लंबी-चौड़ी