श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (कर्म-)योगी अनेक जन्मोंके अनन्तर सिद्धि पाकर अंतमें उत्तम गति पा लेता है ! । [ इन श्लोकोंमें योग, योगभ्रष्ट और योगी शब्द, कर्मयोग, कर्मयोगसे भ्रष्ट और कर्मयोगीके अर्थमेंही व्यवहृत हैं । क्योंकि श्रीमान् कुलमें जन्म लेनेकी स्थिति दूसरोंको इष्ट होना संभवही नहीं है । भगवान् कहते हैं, कि पहलेसे, जितना हो सके उतना, शुद्ध-बुद्धिसे कर्मयोगका आचरण करना आरंभ करे । थोड़ा-ही क्यों न हो, पर इस रीतिसे जो कर्म किया जावेगा, वही इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, इस प्रकार अधिक अधिक सिद्धि मिलनेके लिये उत्तरोत्तर कारणीभूत होगा, और उसीसे अंतमें पूर्ण सद्गति मिलती है । “ इस धर्मका थोड़ा-साभी आचरण किया जाय, तो वह बड़े भयसे रक्षा करता है” (गीता २. ४०), और “अनेक जन्मोंके पश्चात् वासुदेवकी प्राप्ति होती है” (७. १९), ये श्लोक इसी सिद्धान्तके पूरक हैं । अधिक विवेचन गीतारहस्यके प्र. १०, पृ. २८४-२८७में किया गया है । ४४ वें श्लोकके शब्दब्रह्मका अर्थ है “वैदिक यज्ञाग आदि काम्यकर्म” क्योंकि ये कर्म वेदविहित हैं, और वेदोंपर श्रद्धा रखकरही किये जाते हैं; तथा वेद अर्थात् सब सृष्टिके पहलेका शब्द याने शब्दब्रह्म है । प्रत्येक मनुष्य पहले पहल सभी कर्म काम्य-बुद्धिसे-ही किया करता है; परंतु इस कर्मसे जैसे जैसे चित्तशुद्धि हो जाती है, वैसे वैसे आगे निष्काम- बुद्धिसे कर्म करनेकी इच्छा होती है । इसीसे उपनिषदोंमें और महाभारतमेंभी (मैत्र्यु. ६. २२; अमृतबिंदु. १७; महा. शां. २३१. ६३; २६९. १) यह वर्णन है, कि :- द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ “जानना चाहिये, कि ब्रह्म दो प्रकारका है; एक शब्दब्रह्म और दूसरा उससे परेका (निर्गुण) । शब्दब्रह्ममें निष्णात हो जानेपर फिर उससे परेका (निर्गुण) ब्रह्म प्राप्त होता है ।” शब्दब्रह्मके काम्यकर्मोंसे उकता कर अंतमें लोकसंग्रहके अर्थ उन्हीं कर्मोंको करानेवाले कर्मयोगकी इच्छा होती है और फिर इस निष्काम कर्मयोगका थोड़ाबहुत आचरण पहले पहल होने लगता है । “अनन्तर स्वल्पारम्भाः क्षेमकराः”के न्यायसे यही थोड़ा-सा आचरण उस मनुष्यको इस मार्गमें धीरे धीरे आगे खींचता जाता है; और अंतमें क्रम-क्रमसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करा देता है । ४४ वें श्लोकमें जो यह कहा है, कि “कर्मयोगकी इच्छा होनेसेभी वह शब्दब्रह्मके परे चला जाता है” उसका तात्पर्यभी यही है । क्योंकि यह जिज्ञासा कर्मयोगरूपी कोल्हूका मुँह है; और एक बार इस कोल्हूके मुँहमें चले जानेपर फिर इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, कभी न कभी पूर्ण सिद्धि मिलती है । और वह शब्दब्रह्मसे परेके ब्रह्मके ब्रह्मतक पहुँचेबिना नहीं रहता । पहले पहल जान पड़ता है, कि यह सिद्धि जनक आदिको एक-ही जन्ममें