श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर दिया है । अतः पूर्वपक्षका जब विचार करना होता है, तब माना जाता है, कि प्रत्येक पदार्थका सूक्ष्म स्वरूप या आत्मा पृथक् पृथक् है; और यहाँपर अध्यात्म शब्दसे यही अर्थ अभिप्रेत है । महाभारतमें मनुष्यकी इंद्रियोंका उदाहरण देकर स्पष्ट कर दिया है, कि अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-दृष्टिसे एकही विवेचनके इस प्रकार भिन्न भिन्न भेद क्योंकर होते हैं ? ( मभा. शां. ३१३; अश्व. ४१ ) । महाभारतकार कहते हैं, कि मनुष्यकी इंद्रियोंका विवेचन तीन तरहसे किया जा सकता है, जैसे - अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवत । इन इंद्रियोंके द्वारा जो विषय ग्रहण किये जाते हैं - उदाहरणार्थ, हाथोंसे जो लिया जाता है, कानोंसे जो सुना जाता है, आँखोंसे जो देखा जाता है या मनसे जिसका चिंतन किया जाता है,
- वे सब अधिभूत हैं; और हाथ-पैर आदिके ( सांख्यशास्त्रोक्त ) सूक्ष्म स्वभाव अर्थात् सूक्ष्म इंद्रियाँ, इन इंद्रियोंके अध्यात्म हैं । परंतु इन दोनों दृष्टियोंको छोड़कर अधिदैवत-दृष्टिसे विचार करनेपर - अर्थात् यह मान करके, कि हाथोंके देवता इंद्र, पैरोंके विष्णु, गुदके मित्र, उपस्थके प्रजापति, वाणीके अग्नि, आँखोंके सूर्य, कानोंके आकाश अथवा दिशा, जीभके जल, नाकके पृथ्वी, त्वचाके वायु, मनके चंद्रमा, अहंकारके बुद्धि, और बुद्धिके देवता पुरुष हैं । - कहा जाता है, कि येही देवता अपनी अपनी इंद्रियोंके व्यापार किया करते हैं; उपनिषदोंमेंभी उपासनाके लिये ब्रह्मस्वरूपके जो प्रतीक वर्णित हैं, उनमें मनको अध्यात्म और सूर्य अथवा आकाशको अधिदैवत प्रतीक कहा है ( छां. ३. १८. १ ) । अध्यात्म और अधिदैवतका यह भेद केवल उपासनाके लियेही नहीं किया गया है, बल्कि जब इस प्रश्नका निर्णय करना पडा, कि वाणी, चक्षु और श्रोत्र प्रभृति इंद्रियों एवं प्राणोंमें श्रेष्ठ कौन है ? तब उपनिषदोंमें ( बृ. १. ५. २१-२३ ; छां. १. २-३ ; कौषी. ४. १२-१३ ) एक बार वाणी, चक्षु और श्रोत्र इन सूक्ष्म इंद्रियोंको लेकर अध्यात्म दृष्टिसे विचार किया गया है, तथा दूसरी बार उन्हीं इंद्रियोंके देवता अग्नि, सूर्य और आकाशको लेकर अधिदैवत-दृष्टिसे विचार किया गया है । सारांश यह है, कि अधिदैवत, अधिभूत और अध्यात्म आदि भेद प्राचीन कालसे चले आ रहे हैं, और यह प्रश्नभी उसी जमानेका है, कि परमेश्वरके स्वरूपकी इन भिन्न भिन्न कल्पनाओंमेंसे सच्ची कौन है अथवा उसका तथ्य क्या है ? बृहदारण्यक उपनिषद्में ( बृ. ३. ७ ) याज्ञवल्क्यने उद्दालक आरुणिसे कहा है, कि सब प्राणियोंमें, सब देवताओंमें, समग्र अध्यात्ममें, सब लोगोंमें, सब यज्ञोंमें और सब देहोंमें व्याप्त होकर, उनके न समझनेपरभी, उनको नचानेवाला एक-ही परमात्मा है । उपनिषदोंका यही सिद्धान्त वेदान्त-सूत्रके अंतर्यामी अधिकरणमें है ( वे. सू. १. २. १८-२० ), और वहीं यह सिद्ध किया है, कि सबके अंतःकरणमें रहनेवाला यह तत्त्व सांख्योंकी प्रकृति या जीवात्मा नहीं है, किंतु पर- मात्मा है । इसी सिद्धान्तके अनुरोधसे भगवान् अब अर्जुनसे कहते हैं, कि मनुष्यकी देहमें, सब प्राणियोंमें ( अधिभूत ), सब यज्ञोंमें ( अधियज्ञ ), सब देवताओंमें