श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय ७४३ अष्टमोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच । अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥ (अधिदैवत), सब कर्मोंमें, और सब वस्तुओंके सूक्ष्म (अर्थात् अध्यात्म) स्वरूपोंमें एकही परमेश्वर समाया हुआ है, और देवता यज्ञ इत्यादि नानात्व अथवा विविध ज्ञान सच्चा नहीं है। सातवें अध्यायके अंतमें भगवानने अधिभूत आदि जिन शब्दोंका उच्चारण किया है, उनका अर्थ जाननेकी अर्जुनको इच्छा हुई, अतः वह पहले पूछता है :- ] अर्जुनने कहा :- (१) हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्मके माने क्या हैं ? अधिभूत किसे कहना चाहिये ? और अधिदैवत किसको कहते हैं ? (२) अधियज्ञ कैसा होता है ? हे मधुसूदन ! इस देहमें (अधिदेह) कौन है ? और ( मुझे यह बतलाओ, कि ) अंतकालमें इंद्रियनिग्रह करनेवाले (लोग) तुमको कैसे पहचानते हैं ? | [ ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत और अधियज्ञ शब्द पिछले अध्यायमें | आ चुके हैं; इनके सिवा अब अर्जुनने यह नया प्रश्न किया है, कि अधिदेह कौन | है ? इसपर ध्यान देनेसे आगेके उत्तरका अर्थ समझनेमें कोई अडचन न होगी । ] श्रीभगवानने कहा :- (३) (सबसे) परम अक्षर अर्थात् कभीभी नष्ट न होनेवाला तत्त्व ब्रह्म है, (और) प्रत्येक वस्तुका अपना मूल भाव (स्वभाव) अध्यात्म कहलाता है। (अक्षर-ब्रह्मसे ) भूतमात्रादि (चर-अचर ) पदार्थोंकी उत्पत्ति करने- वाला विसर्ग अर्थात् सृष्टि-व्यापार कर्म है। (४) ( उपजे हुए सब प्राणियोंकी ) क्षर अर्थात् नामरूपात्मक या नाशवान् स्थिति अधिभूत है; और ( इस पदार्थमें )