भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 789

७४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जो पुरुष अर्थात् सचेतन अधिष्ठाता है, वह अधिदैवत है; हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ ! (जिसे) अधियज्ञ (अर्थात् सब यज्ञोंका अधिपति कहते हैं, वह) मैंही इस देहमें (अधिदेह) हूँ। | [तीसरे श्लोकका 'परम' शब्द ब्रह्मका विशेषण नहीं है, किंतु अक्षरका | विशेषण है। सांख्यशास्त्रमें अव्यक्त प्रकृतिकोभी 'अक्षर' कहा है (गीता | १५. १६)। परंतु वेदान्तियोंका ब्रह्म इस अव्यक्त और अक्षर प्रकृतिकेभी | परेका है (इसी अध्यायका २० वाँ और ३१ वाँ श्लोक देखो); और इसी | कारण केवल 'अक्षर' शब्दके प्रयोगसे सांख्योंकी प्रकृति अथवा ब्रह्म, ये दोनों | अर्थ हो सकते हैं। इस संदेहको मिटानेके लिये 'अक्षर' शब्दके आगे 'परम' विशेषण | रख कर ब्रह्मकी व्याख्या की है (गीतार. प्र. ९, पृ. २०२-२०३)। हमने | 'स्वभाव' शब्दका अर्थ, ऊपर दिये हुए महाभारतके उदाहरणोंके अनुसार, किसीभी | पदार्थका 'सूक्ष्म स्वरूप' किया है। नासदीय सूक्तमें दृश्य जगतको परब्रह्मकी | विसृष्टि (विसर्ग) कहा है (गीतार. प्र. ९, पृ. २५६); और विसर्ग शब्दका | वही अर्थ यहाँ लेना चाहिये। विसर्गका अर्थ 'यज्ञका हविरुत्सर्ग' करनेकी कोई | जरूरत नहीं है। गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृ. २६४) इस बातका विस्तृत | विवेचन किया गया है, कि इस दृश्य-सृष्टिकोही कर्म क्यों कहते हैं? पदार्थमात्रके | नामरूपात्मक विनाशी स्वरूपको 'क्षर' कहते हैं; और इससे परे जो अक्षर तत्त्व | है. उसको ब्रह्म समझना चाहिये। 'पुरुष' शब्दमे सूर्यका पुरुष, जलके देवता | या वरुणपुरुष इत्यादि सचेतन सूक्ष्म देहधारी देवता विवक्षित हैं और | हिरण्यगर्भ काभी उसमें समावेश होता है। यहाँ भगवानने 'अधियज्ञ' शब्दकी | व्याख्या नहीं की। क्योंकि, यज्ञके विषयमें पीछे तीसरे और चौथे अध्यायोंमें | विस्तारसहित वर्णन हो चुका है और फिर आगेभी कहा है, कि 'सब | यज्ञोंका प्रभु और भोक्ता मैंही हूँ (गीता ९. २४; ५. २९; मभा. शां. | ३४०)। इस प्रकार अध्यात्म आदिके लक्षण बतलाकर अंतमें संक्षेपसे कह | दिया है, कि इस देहमें 'अधियज्ञ' (जिसे कहते हैं) वही मैं हूँ, अर्थात् | मनुष्यदेहमें अधिदेह और अधियज्ञभी मैंही हूँ। प्रत्येक देहमें पृथक् पृथक् | आत्मा (पुरुष) मानकर सांख्यवादी कहते हैं, कि वे असंख्य हैं। परंतु | वेदान्तशास्त्रको यह मत मान्य नहीं है, उसने निश्चय किया है, कि यद्यपि | देह अनेक हैं, तथापि सबमें आत्मा एकही है (गीतार. प्र. ७, पृ. १६६)। | 'अधिदेह मैंही हूँ' इस वाक्यमें यही सिद्धान्त दर्शाया है; तोभी इस वाक्यके | 'मैंही हूँ' शब्द केवल अधियज्ञ अथवा अधिदेहकोही उद्देश्य करके प्रयुक्त | नहीं हैं; उनका संबंध अध्यात्म आदि पूर्वपदोंसेभी है। अतः समग्र अर्थ ऐसा | होता है, कि अनेक प्रकारके यज्ञ, अनेक पदार्थोंके अनेक देवता, विनाशवान् | पंचमहाभूत, पदार्थमात्रके सूक्ष्म भाग अथवा विभिन्न आत्मा, ब्रह्म, कर्म अथवा