श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय ७४५ § § अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥ । भिन्न भिन्न मनुष्योंकी देह - इन सबमें 'मैंही हूँ', अर्थात् सबमें एकही परमेश्वर- । तत्व है। कई लोगोंका कथन है, कि यहाँ 'अधिदेह' स्वरूपका स्वतंत्र वर्णन । नहीं है, अधियज्ञकी व्याख्या करते समय अधिदेहका उसमें पर्यायसे उल्लेख हो । गया है। किंतु हमें यह अर्थ ठीक नहीं जान पड़ता। क्योंकि, न केवल गीतामेंही, । प्रत्युत उपनिषदों और वेदान्त-सूत्रोंमेंभी (बृ. ३. ७; वे. सू. १. २. २०) जहाँ । यह विषय आया है, वहाँ अधिभूत आदि स्वरूपोंके साथही शरीर आत्माकाभी । विचार किया है, और सिद्धान्त किया है, कि सर्वत्र एकही परमात्मा है। ऐसेही । गीतामें जब कि अधिदेहके विषयमें पहलेभी प्रश्न हो चुका है, तब यहाँ उसके । पृथक् उल्लेखकोही विवक्षित मानना युक्तिसंगत है। यदि यह सच है, कि सब । कुछ परब्रह्मही है, तो पहले पहल ऐसा बोध होना संभव है, कि उसके अधिभूत । आदि स्वरूपोंका वर्णन करते समय उसमें परब्रह्मकोभी शामिल कर लेनेकी कोई । जरूरत न थी। परंतु नानात्वदर्शक यह वर्णन उन लोगोंको लक्ष्य करके किया । गया है, कि जो ब्रह्म, आत्मा, देवता और यज्ञनारायण आदि अनेक भेद करके । नाना प्रकारकी उपासनाओंमें उलझे रहते हैं, अतएव पहले उन लक्षण बतलाये । गये हैं, कि जो उन लोगोंकी समझके अनुसार होते हैं, और फिर यह भेदोंके । सिद्धान्त किया गया है, कि "यह सब मैंही हूँ"। उक्त बातपर ध्यान देनेसे । कोईभी शंका नहीं रह जाती। अस्तु; इस भेदका तत्त्व बतला दिया गया, कि । उपासनाके लिये अधिभूत, अधिदैवत, अध्यात्म, अधियज्ञ और अधिदेह प्रभृति । अनेक भेद करनेपरभी यह नानात्व सच्चा नहीं है, और वास्तवमें एकही । परमेश्वर सबमें व्याप्त है। अब अर्जुनके इस अंतिम प्रश्नका उत्तर देते हैं, कि । अंतकालमें यह सर्वव्यापी भगवान् कैसे पहचाना जाता है :- ] (५) और इसमें संदेह नहीं है, कि अंतकालमें जो मेराही स्मरण करता हुआ देह त्यागता है, वह मेरे स्वरूपमें मिल जाता है। (६) अथवा हे कौन्तेय ! सदा अर्थात् जन्मभर उसमें रँगे रहनेसे मनुष्य जिस भावका स्मरण करता हुआ अंतमें शरीर त्यागता है, (आगे) उसीमें (भाव) वह जा मिलता है। । [ पाँचवें श्लोकमे मरण-समयमें परमेश्वरके स्मरण करनेकी आवश्यकता । और फल बतलाया है। परंतु संभव है, कि इससे कोई यह समझ ले, कि केवल । मरण-कालमें यह स्मरण करनेसेही काम चल जाता है, इसीलिये छठे श्लोकमें