श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥ | यह बतलाया है, कि जो बात जन्मभर मनमें रहती है, वह मरण-कालमेंभी नहीं | छूटती, अतएव न केवल मरण-कालमेंभी प्रत्युत जन्मभरभी परमेश्वरका स्मरण | और उपासना करनेकी आवश्यकता सिद्ध हुई है ( गीतार. प्र. १०, पृ. २९० ) । | इस सिद्धान्तको मान लेनेसे आपही सिद्ध हो जाता है, कि अंतकालमें परमेश्वरको | भजनेवाले परमेश्वरको पाते हैं और देवताओंका स्मरण करनेवाले देवता- | ओंको पाते हैं ( गीता ७. २३; ८. १३; ९. २५ ) । क्योंकि छांदोग्य उपनिषदके | कथनानुसार “ यथा ऋतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति ” ( छां० | ३. १४. १) - इस लोकमें मनुष्यका जैसा ऋतु अर्थात् संकल्प होता है, मरनेपर | उसे वैसीही गति मिलती है। छांदोग्यके समान अन्य उपनिषदोंमेंभी ऐसेही | वाक्य हैं ( प्रश्न. ३. १०; मैत्र्यु. ४. ६) । परंतु गीता अब यह कहती है, कि | जन्मभर एकही भावनासे मनको रंगे बिना, अंतकालकी यातनाके समय वही | भावना स्थिर नहीं रह सकती। अतएव आमरण अर्थात् आजीवन परमेश्वरका | ध्यान करना आवश्यक है ( वे. सू. ४. १. १२ ) - इस सिद्धान्तके अनुसार | अर्जुनसे भगवान् कहते हैं, कि :- ] (७) इसलिये सर्वकाल अर्थात् सदैवही मेरा स्मरण करता रह, और युद्ध कर । मुझमें मन और बुद्धि अर्पण करनेसे ( युद्ध करनेपरभी ) मुझमेंही निःसंदेह आ मिलेगा। (८) हे पार्थ ! चित्तको दूसरी ओर न जाने देकर अभ्यासकी सहायतासे उसको स्थिर करके दिव्य परम पुरुषका ध्यान करते रहनेसे मनुष्य उसी पुरुषमें जा मिलता है । | [ जो लोग भगवद्गीतामें इस विषयका प्रतिपादन बतलाते हैं, कि संसार- | को छोड़ दो और केवल भक्तिकाही अवलंब करो, उन्हें सातवें श्लोकके सिद्धान्त- | की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। मोक्ष तो परमेश्वरकी ज्ञानयुक्त भक्तिसे | मिलता है; और यह निर्विवाद है, कि मरण-समयमेंभी उसी भावनाको स्थिर | रहनेके लिये जन्मभर वही अभ्यास करना चाहिये । किंतु गीताका यह अभिप्राय | नहीं, कि उसके लिये कर्मोंको छोड़ देना चाहिये; इसके विरुद्ध गीताशास्त्रका | सिद्धान्त है, कि स्वधर्मके अनुसार जो कर्म प्राप्त होते जायें, भगवद्भक्तको उन | सबको निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये, और उसी सिद्धान्तको इन शब्दोंसे | व्यक्त किया है, कि “मेरा सदैव चिंतन कर; और युद्ध कर।” अस्तु; अब