भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 792

आठवाँ अध्याय ७४७ § § कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥ प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ । बतलाते हैं, कि परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे जन्मभर निष्काम कर्म करनेवाले कर्मयोगी । अंतकालमेंभी दिव्य परम पुरुषका चिंतन किस प्रकारसे करते हैं । ] (९) कवि अर्थात् सर्वज्ञ, पुरातन, शास्ता अणुसेभी छोटे, सबके धाता अर्थात् आधार या कर्ता, अचिंत्यस्वरूप, और अंधकारसे परेके सूर्यके समान देदीप्यमान पुरुषका स्मरण ( जो पुरुष ), करता है, वह ( मनुष्य ) उसी दिव्य परम पुरुषमें जा मिलता है। (१०) अंतकालमें ( इंद्रियनिग्रहरूप ) योगकी सामर्थ्यसे और भक्तियुक्त होकर मनको स्थिर करके और दोनों भौंहोंके बीचमें प्राणको भली भांति रखकर, (११) वेदके जाननेवाले जिसे अक्षर कहते हैं, वीतराग हो कर यति लोग जिसमें प्रवेश करते हैं और जिसकी इच्छा करके ब्रह्मचर्यव्रतका आचरण करते हैं, वह पद अर्थात् ॐकारब्रह्म तुझे संक्षेपसे बतलाता हूँ । (१२) सब ( इंद्रियरूपी ) द्वारोंका संयमकर और मनका हृदयमें निरोध करके, ( एवं ) मस्तकमें, अपना प्राण ले जाकर समाधियोगमें स्थिर होनेवाला, (१३) इस एकाक्षर ब्रह्म ॐका जप और मेरा स्मरण करता हुआ जो ( मनुष्य ) देह छोड़ कर जाता है, उसे उत्तम गति मिलती है । । [ श्लोक ९-११ में परमेश्वरके स्वरूपका जो वर्णन है, वह उपनिषदोंसे । लिया गया है । नवें श्लोकका 'अणोरणीयान्' पद और अंतका चरण श्वेताश्वतर । उपनिषदका है ( श्वे. ३. ८, ९ ), एवं ग्यारहवें श्लोकका पूर्वार्ध अर्थतः और । उत्तरार्ध शब्दशः कठ उपनिषदका है ( कठ. २. १५ ) । कठ उपनिषदमें “ तत्ते । पदं संग्रहेण ब्रवीमि ” इस चरणके आगे 'ओमित्येतत्' स्पष्ट कहा गया है, इससे । प्रकट होता है, कि ११ वें श्लोकके 'अक्षर' और 'पद' शब्दोका अर्थ ॐ । वर्णाक्षररूपी ब्रह्म अथवा ॐ शब्द लेना चाहिये; और १३ वें श्लोकसेभी प्रकट

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