श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ | होता है, कि यहाँ ॐकारोपासनाही उद्दिष्ट है (प्रश्न. ५) । तथापि यह नहीं | कह सकते, कि भगवानके मनमें 'अक्षर = अविनाशी ब्रह्म, और 'पद'= परम | स्थान, ये अर्थभी न होंगे । क्योंकि, वर्णमालाका ॐ एक अक्षर है, और इसके | सिवा यह कहा जा सकेगा, कि वह ब्रह्मके प्रतीकके नाते अविनाशीभी है | (२१ वाँ श्लोक देखो) । इसलिये ११ वें श्लोकके अनुवादमें 'अक्षर' और | 'पद' ये दुहरे अर्थवाले मूल शब्दही हमने रख लिये हैं । अब इस उपासनासे | मिलनेवाली उत्तर गतिकाह्री अधिक निरूपण करते हैं :-- ] (१४) हे पार्थ ! अनन्यभावसे सदा-सर्वदा जो मेरा नित्य स्मरण करता रहता है, उस नित्ययुक्त (कर्म-) योगीको मैं अर्थात् मेरी प्राप्ति सुलभ रीतिसे होती है। (१५) मुझमें मिल जानेपर, परमसिद्धि पाये हुए महात्मा उस पुनर्जन्मको नहीं पाते, कि जो दुःखोंका घर है और अशाश्वत है। (१६) हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकतक (स्वर्ग आदि ) जितने लोक हैं वहाँसे ( कभी न कभी इस लोकमें ) पुनरावर्तन अर्थात् लौटना (पड़ता) है। परंतु हे कौन्तेय ! मुझमें मिल जानेपर पुनर्जन्म नहीं होता । | [ सोलहवें श्लोकके 'पुनरावर्तन' शब्दका अर्थ पुण्य चुक जानेपर भूलोकमें | लौट आना है ( गीता ९. २१; मभा. वन. २६० ) । यज्ञ, देवताराधन और | वेदाध्ययन प्रभृति कर्मोंसे यद्यपि इंद्रलोक, वरुणलोक, सूर्यलोक और कदाचित् | ब्रह्मलोक प्राप्त हो जावे, तथापि पुण्यांशके समाप्त होतेही वहाँसे लौटकर फिर | इस लोकमें जन्म लेना पड़ता है ( बृ. ४. ४. ६ ) ; अथवा अंततः ब्रह्मलोकका | नाश हो जानेपर पुनर्जन्मचक्रमें तो जरूरही गिरना पड़ता है। अतएव, उक्त | १६ वें श्लोकका भावार्थ यह है, कि ऊपर लिखी हुई सब गतियाँ कम दर्जेकी हैं | और परमेश्वरके ज्ञानसेही पुनर्जन्म नष्ट होता है, इस कारण वही गति सर्वश्रेष्ठ | है ( गीता ९. २०, २१ ) । अंतमें जो कहा है, कि ब्रह्मलोककी प्राप्तिभी | अनित्य है, उसके समर्थनमें अब बतलाते हैं, कि ब्रह्मलोकसहित समस्त सृष्टिकी | उत्पत्ति और लय वारंवार कैसे होता रहता है :- ]