भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 956 में से

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पृष्ठ 794

आठवाँ अध्याय ७४९ § § सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ (१७) अहोरात्रको (तत्त्वतः) जाननेवाले पुरुष समझते हैं, कि (कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, इन चारों युगोंका एक महायुग होता है, और ऐसे) हज़ार (महा-)युगोंका समय ब्रह्मदेवका एक दिन है, और (ऐसेही) हज़ार युगोंकी (उसकी) एक रात्रि है। । [ यह श्लोक इससे पहलेके युगमानका हिसाब न देकर गीतामें आया है; । और इसका अर्थ अन्यत्र बतलाये हुए हिसाबसे करना चाहिये । यह हिसाब और । गीताका यह श्लोकभी भारत (शां. २३१. ३१) और मनुस्मृतिमें (मनु. १. । ७३) है; तथा यास्कके निरुक्तमेंभी यही अर्थ वर्णित है (निरुक्त १४. ९) । । ब्रह्मदेवके दिनकोही कल्प कहते हैं। अगले श्लोकमें अव्यक्तका अर्थ सांख्य- । शास्त्रकी अव्यक्त प्रकृति है, अव्यक्तका अर्थ परब्रह्म नहीं है; क्योंकि २० वें । श्लोकमें स्पष्ट बतला दिया है, कि ब्रह्मरूपी अव्यक्त, १८ वें श्लोकमें वर्णित । अव्यक्तसे परेका और भिन्न है। गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें (पृ. १९४) । इसका पूरा स्पष्टीकरण है, कि अव्यक्तसे व्यक्त-सृष्टि कैसे होती है और कल्पके । कालमानका हिसाबभी वहीं लिखा है।] (१८) (ब्रह्मदेवके) दिनका आरंभ होनेपर अव्यक्तसे सब व्यक्त (पदार्थ) निर्मित होते हैं और रात्रि होनेपर उसी पूर्वोक्त अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं। (१९) हे पार्थ! भूतोंका वही समुदाय (इस प्रकार) बार बार उत्पन्न होकर अवश होता हुआ, अर्थात् इच्छा हो या न हो – रात होतेही लीन हो जाता है, और दिन होनेपर (फिर) जन्म लेता है। । [ अर्थात् पुण्यकर्मोंसे नित्य ब्रह्मलोकवास प्राप्तभी हो जाय, तोभी प्रलय- । कालमें ब्रह्मलोककाभी नाश हो जानेसे फिर नये कल्पके आरंभमें प्राणियोंका । जन्म लेना नहीं छूटता। इससे बचनेके लिये जो एकही मार्ग है, उसे अब । बतलाते हैं :- ]

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