श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१ ॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥ (२०) किंतु इस ऊपर बतलाये हुए अव्यक्तसे परे दूसरा सनातन अव्यक्त पदार्थ है, कि जो सब भूतोंके नाश होनेपरभी नष्ट नहीं होता, (२१) जिस अव्यक्तको 'अक्षर' (भी) कहते हैं, वही परम अर्थात् उत्कृष्ट या अंतकी गति कहा जाता है; (और) जिसे पाकर फिर (जन्ममें) लौटते नहीं है, (वही) मेरा परम स्थान (भी) है। (२२) हे पार्थ ! जिसके भीतर (सब) भूत हैं और जिसने इन सबको फैलाया अथवा व्याप्तकर रखा है, वह पर अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष अनन्यभक्तिसेही प्राप्त होता है। [ बीसवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक मिलकर एक वाक्य बना है। इनमेंसे २० वें श्लोकका 'अव्यक्त' शब्द पहले सांख्योंकी प्रकृतिको, अर्थात् १८ वें श्लोकके अव्यक्त द्रव्यको लक्ष्य करके प्रयुक्त है और आगे वही शब्द सांख्योंकी प्रकृतिसे परेके परब्रह्मके लियेभी उपयुक्त हुआ है; तथा २१ वें श्लोकमें कहा है, कि इसी दूसरे अव्यक्तको 'अक्षर'भी कहते हैं; ऐसेही अध्यायके आरंभमेंभी "अक्षरं ब्रह्म परमम्" यह वर्णन है। सारांश, 'अव्यक्त' शब्दके समानही गीतामें 'अक्षर' शब्दकाभी दो प्रकारसे उपयोग किया गया है। यह नहीं, कि सांख्योंकी प्रकृति ही अव्यक्त और अक्षर है; किंतु परमेश्वर या ब्रह्मभी, कि जो "सब भूतोंका नाश हो जानेपरभी नष्ट नहीं होता", अव्यक्त तथा अक्षर है। पंद्रहवें अध्यायमें पुरुषोत्तमके लक्षण बतलाते हुए जो यह वर्णन है, कि वह क्षर और अक्षरसे परेका है, उससे प्रकट है, कि वहांका 'अक्षर' शब्द सांख्योंकी प्रकृतिके लिये उद्दिष्ट है (गीता १५. १६-१८)। ध्यान रहे, कि 'अव्यक्त' और 'अक्षर' इन दोनों विशेषणोंका प्रयोग गीतामें कभी सांख्यांकी प्रकृतिके लिये, और कभी इस प्रकृतिसे परेके परब्रह्मके लिये किया गया है (गीतार. प्र. ९, पृ. २०२-२०३)। व्यक्त और अव्यक्तसे परे जो परब्रह्म है, उसका स्वरूप गीतारहस्यके नवे प्रकरणमें स्पष्ट कर दिया गया है। जिस स्थानमें पहुँच जानेसे मनुष्य पुनर्जन्मकी चपेटसे छूट जाता है, उस 'अक्षर-ब्रह्म'का वर्णन हो चुका, अब मरनेपर जिन्हें लौटना नहीं पड़ता (अनावृत्ति), और जिन्हें स्वर्गमें लौटकर फिर जन्म लेना पड़ता है (आवृत्ति), उनके बीचके समयका और गतिका भेद बतलाते हैं:- ]