श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय ७५१ § § यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥ शुक्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥ § § नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥ (२३) हे भरतश्रेष्ठ! अब तुझे मैं वह काल बतलाता हूँ, कि जिस कालमें मरनेपर (कर्म-)योगी ( इस लोकमें जन्मनेके लिये ) लौट नहीं आते, और ( जिस कालमें मरनेपर ) लौट आते हैं । (२४) अग्नि, ज्योति, अर्थात् ज्वाल, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके छः महीनोंमें मरे हुए ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्मको पाते हैं ( लौटकर नहीं आते ) । (२५) ( अग्नि ), धुआ, रात्रि, कृष्णपक्ष (और) दक्षिणायनके छः महीनोंमें मरा हुआ (कर्म-)योगी चंद्रके तेजमे अर्थात् चंद्रलोकमें जा कर ( पुण्यांश घटनेपर ) लौट आता है। (२६) इस प्रकार जगत्की शुक्ल और कृष्ण अर्थात् प्रकाशमय और अंधकारमय, ये दो शाश्वत गतियाँ याने स्थिर मार्ग माने जाते हैं । एक मार्गसे जानेपर लौटना नहीं पड़ता, और दूसरेसे फिर लौटना पड़ता है । | [ उपनिषदोंमें इन दोनों गतियोंको देवयान (शुक्ल) और पितृयाण | (कृष्ण), अथवा अर्चिरादि मार्ग और धूम्र-आदि मार्ग कहा है, तथा ऋग्वेदमेंभी | इन मार्गोंका उल्लेख है। मरे हुए मनुष्यकी देहको अग्निमें जला देनेपर अर्थात् | अग्निसेही इन दोनों मार्गोंका आरंभ हो जाता है, अतएव पच्चीसवें श्लोकमें | 'अग्नि' पदका पहले श्लोकसे अध्याहार कर लेना चाहिये । पच्चीसवें श्लोकका | हेतु यही बतलाना है, कि प्रथम श्लोकोंमें वर्णित मार्गमें और दूसरे मार्गमें | भेद कहाँ होता है, इसीसे 'अग्नि शब्दकी पुनरावृत्ति उसमें नही की गई । | गीतारहस्यके दसवें प्रकरणके अंतमें ( पृ. २९७-२९८ ) इस संबंधकी अधिक | बातें है । उनसे उल्लिखित श्लोकका भावार्थ खुल जावेगा । अब बतलाते | हैं, कि इन दोनों मार्गोंका तत्त्व जान लेनेसे क्या फल मिलता है :- ] (२७) हे पार्थ ! इन दोनों सृतियोंको अर्थात् मार्गोंको (तत्त्वतः) जाननेवाला