भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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७५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ कोईभी (कर्म-) योगी मोहमें नहीं फँसता; अतएव हे अर्जुन ! तू सदासर्वदा (कर्म-) योगयुक्त हो । (२८) इसे (उक्त तत्त्वको) जान लेनेसे वेद, यज्ञ, तप और दानमें जो पुण्यफल बतलाया है, (कर्म-) योगी उस सबको छोड़ जाता है और उसके परेके आद्यस्थानको पा लेता है । [ जिस मनुष्यने देवयान और पितृयाण, इन दोनों मार्गोंके तत्त्वको जान लिया, अर्थात् यह ज्ञात कर लिया, कि देवयान-मार्गसे मोक्ष मिल जानेपर पुनर्जन्म नहीं मिलता और पितृयाण-मार्ग स्वर्गप्रद हो, तोभी मोक्षप्रद नहीं है, वह इनमेंसे अपने सच्चे कल्याणके मार्गकाही स्वीकार करेगा, मोहसे निम्न श्रेणीके मार्गको स्वीकार न करेगा - इसी बातको लक्ष्य कर पहले श्लोकमें "इन दोनों सृतियोंको अर्थात् मार्गोंको (तत्त्वतः) जाननेवाला" ये शब्द आये हैं। इन श्लोकोंका भावार्थ यों है :- कर्मयोगी जानता है, कि देवयान और पितृयाण, इन दोनों मार्गोंमेंसे कौन मार्ग कहाँ जाता है, इसीसे उनमेंसे जो मार्ग उत्तम है, उसे ही वह स्वभावत स्वीकार करता है, एवं स्वर्गके आवागमनसे बचकर उससे परेके मोक्षप्रदकी प्राप्ति कर लेता है । २७ वें श्लोकमें तदनुसार व्यवहार करनेका अर्जुनको उपदेशभी किया गया है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवाद में, अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।