श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय ७५३ नवमोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥ नवाँ अध्याय [ सातवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानका निरूपण यह दिखलानेके लिये किया गया है, कि कर्मयोगका आचरण करनेवाले पुरुषको परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होकर मनकी शांति अथवा मुक्त-अवस्था कैसे प्राप्त होती है ? फिर अक्षर और अव्यक्त पुरुषका स्वरूपभी बतला दिया गया है, और पिछले अध्यायमें कहा गया है, कि अंतकाल मेंभी उस स्वरूपको मनमें स्थिर रखनेके लिये पातंजलयोगसे समाधि लगाकर, अंतमें ॐकारकी उपासना की जावे । परंतु पहले तो अक्षर-ब्रह्मका ज्ञान होनाही कठिन है, और फिर उसमेंभी समाधिकी आवश्यकता होनेसे साधारण लोगोंको तो यह मार्ग छोड़ही देना पड़ेगा । इस कठिनाईपर ध्यान देकर अब भगवान् ऐसा राजमार्ग बतलाते हैं, कि जिससे सब लोगोंको परमेश्वरका ज्ञान सुलभ हो जावे । इसीको भक्तिमार्ग कहते हैं,और गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें हमने उसका विस्तारसहित विवेचन किया है। इस मार्गमें परमेश्वरका स्वरूप प्रेमगम्य और व्यक्त अर्थात् प्रत्यक्ष जाननेयोग्य रहता है; और उसी व्यक्त स्वरूपका विस्तृत निरूपण नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें अध्यायोंमें किया गया है । तथापि स्मरण रहे, कि यह भक्ति-मार्गभी स्वतंत्र नहीं है, कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें अध्यायमें जिस ज्ञान-विज्ञानका आरंभ किया गया है, उसीका यह भाग है; और इस अध्यायका आरंभभी पिछले ज्ञान-विज्ञानके अंगकी दृष्टिसेही किया गया है । ] श्रीभगवानने कहा :-- (१) अब तू दोषदर्शी नहीं है, इसलिये गुह्यसेभी गुह्य विज्ञानसहित ज्ञान तुझे बतलाता हूँ, जिसके जान लेनेसे पापसे मुक्त होगा । (२) यह (ज्ञान) समस्त गुह्योंमें राजा अर्थात् श्रेष्ठ, राजविद्या अर्थात् सब विद्याओंमें श्रेष्ठ, पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष बोध देनेवाला, आचरण करनेमें सुखकारक, अव्यक्त और धर्म्य है। गी. र. ४८