भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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७५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥ § § मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥ (३) हे परन्तप ! इस धर्मपर श्रद्धा न रखनेवाले पुरुष मुझे नहीं पाते वे मृत्यु- युक्त संसारके मार्गमें लौट आते हैं; (अर्थात् उन्हें मोक्ष नहीं मिलता) । | [गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें (पृ. ४१३ ते ४१९) दूसरे श्लोकके | 'राजविद्या', 'राजगुह्य', और 'प्रत्यक्षावगम' पदोंके अर्थोंका विचार किया गया | है। ईश्वर-प्राप्तिके साधनोंको उपनिषदोंमें 'विद्याएँ' कहा है और ये विद्या गुप्त | रखी जाती थीं। कहा है, कि भक्ति-मार्ग अथवा व्यक्तकी उपासनारूपी विद्या | इन सब गुह्य विद्याओंमें श्रेष्ठ अथवा राजा है, इसके अतिरिक्त यह धर्म आँखोंसे | प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला और इसीसे आचरण करनेमें सुलभ है। तथापि इक्ष्वाकु | प्रभृति राजाओंकी परंपरासेही इस योगका प्रचार हुआ है (गीता ४. २), | इसलिये इस मार्गको राजाओं अर्थात् बडे आदमियोंकी विद्या - राजविद्या - | कह सकेंगे। कोईभी अर्थ क्यों न लें, प्रकट है कि अक्षर या अव्यक्त ब्रह्मके ज्ञानको | लक्ष्य करके यह वर्णन नहीं किया गया है, किंतु राजविद्या शब्दसे यहाँपर भक्ति- | मार्गही विवक्षित है। इस प्रकार आरंभमेंही इस मार्गकी प्रशंसाकर भगवान् अब | विस्तारसे उसका वर्णन करते हैं :- ] (४) मैंने अपने अव्यक्त स्वरूपसे इस समग्र जगतको फैलाया अथवा व्याप्त किया है। मुझमें सब भूत हैं, (परंतु) मैं उनमें नहीं हूँ। (५) और मुझमें सब भूतभी नहीं हैं! देखो, (यह कैसी) मेरी ईश्वरी करनी या योगसामर्थ्य है! भूतोंको उत्पन्न करनेवाला मेरा आत्मा; भूतोंका धारण करकेभी (फिर) भूतोंमें नहीं है! (६) सर्वत्र बहनेवाला महान् वायु जिस प्रकार सर्वदा आकाशमें रहता है उसी प्रकार सब भूतोंको मुझमें समझ। | [यह विरोधाभास इसलिये होता है, कि परमेश्वर निर्गुण है और सगुणभी | है (सातवें अध्यायके १२ वें श्लोककी टिप्पणी, और गीतारहस्य प्र. ९, | पृ. २०६, २०९, २१० देखो)। इस प्रकार अपने स्वरूपका आश्चर्यकारक वर्णन