श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
७५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥ § § मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥ (३) हे परन्तप ! इस धर्मपर श्रद्धा न रखनेवाले पुरुष मुझे नहीं पाते वे मृत्यु- युक्त संसारके मार्गमें लौट आते हैं; (अर्थात् उन्हें मोक्ष नहीं मिलता) । | [गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें (पृ. ४१३ ते ४१९) दूसरे श्लोकके | 'राजविद्या', 'राजगुह्य', और 'प्रत्यक्षावगम' पदोंके अर्थोंका विचार किया गया | है। ईश्वर-प्राप्तिके साधनोंको उपनिषदोंमें 'विद्याएँ' कहा है और ये विद्या गुप्त | रखी जाती थीं। कहा है, कि भक्ति-मार्ग अथवा व्यक्तकी उपासनारूपी विद्या | इन सब गुह्य विद्याओंमें श्रेष्ठ अथवा राजा है, इसके अतिरिक्त यह धर्म आँखोंसे | प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला और इसीसे आचरण करनेमें सुलभ है। तथापि इक्ष्वाकु | प्रभृति राजाओंकी परंपरासेही इस योगका प्रचार हुआ है (गीता ४. २), | इसलिये इस मार्गको राजाओं अर्थात् बडे आदमियोंकी विद्या - राजविद्या - | कह सकेंगे। कोईभी अर्थ क्यों न लें, प्रकट है कि अक्षर या अव्यक्त ब्रह्मके ज्ञानको | लक्ष्य करके यह वर्णन नहीं किया गया है, किंतु राजविद्या शब्दसे यहाँपर भक्ति- | मार्गही विवक्षित है। इस प्रकार आरंभमेंही इस मार्गकी प्रशंसाकर भगवान् अब | विस्तारसे उसका वर्णन करते हैं :- ] (४) मैंने अपने अव्यक्त स्वरूपसे इस समग्र जगतको फैलाया अथवा व्याप्त किया है। मुझमें सब भूत हैं, (परंतु) मैं उनमें नहीं हूँ। (५) और मुझमें सब भूतभी नहीं हैं! देखो, (यह कैसी) मेरी ईश्वरी करनी या योगसामर्थ्य है! भूतोंको उत्पन्न करनेवाला मेरा आत्मा; भूतोंका धारण करकेभी (फिर) भूतोंमें नहीं है! (६) सर्वत्र बहनेवाला महान् वायु जिस प्रकार सर्वदा आकाशमें रहता है उसी प्रकार सब भूतोंको मुझमें समझ। | [यह विरोधाभास इसलिये होता है, कि परमेश्वर निर्गुण है और सगुणभी | है (सातवें अध्यायके १२ वें श्लोककी टिप्पणी, और गीतारहस्य प्र. ९, | पृ. २०६, २०९, २१० देखो)। इस प्रकार अपने स्वरूपका आश्चर्यकारक वर्णन
नवाँ अध्याय ७५५ § § सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥ न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥ करके अर्जुनकी जिज्ञासाको जागृतकर चुकनेपर अब भगवान् फिर कुछ फेरफारसे वही वर्णन प्रसंगानुसार करते हैं, कि जो सातवें और आठवें अध्यायमें पहले किया जा चुका है - अर्थात् मुझसे व्यक्त-सृष्टि किस प्रकार होती है और मेरे व्यक्त रूप कौन-से हैं (गीता ७. ४-१८; ८. १७-२०) । 'योग' शब्दका अर्थ यद्यपि अलौकिक सामर्थ्य या युक्ति किया जाय, तथापि स्मरण रहे, कि अव्यक्तसे व्यक्त होनेके इस योग अथवा युक्तिकोही माया कहते हैं । इस विषयका प्रतिपादन गीता ७. २५ की टिप्पणीमें और रहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २३८- २४१) हो चुका है । परमेश्वरको यह 'योग' अत्यंत सुलभ है, कदाचित् यह परमेश्वरका दासही है, इसलिये परमेश्वरको योगेश्वर (गीता १८. ७५) कहते हैं । अब बतलाते हैं, कि इस योगसामर्थ्यसे जगतकी उत्पत्ति और नाश कैसे हुआ करते हैं:-] (७) हे कौन्तेय ! कल्पके अंतमें सब भूत मेरी प्रकृतिमें आ मिलते हैं, और कल्पके आरंभमें (अर्थात् ब्रह्माके दिनके आरंभमें) उनको मैंही फिर निर्माण करता हूँ । (८) मैं अपनी प्रकृतिकों हाथमें लेकर, (अपने अपने कर्मोंसे बँधे हुए) भूतोंके उस समस्त समुदायको पुनः पुनः निर्माण करता हूँ, कि जो (उस) प्रकृतिके काबूमें रहनेसे अवश अर्थात् परतंत्र है । (९) (परंतु) हे धनंजय ! इस (सृष्टि- निर्माण करनेके) काममें मेरी आसक्ति नहीं है, मैं उदासीनसा रहता हूँ, इस कारण मुझे वे कर्म बंधक नहीं होते । (१०) मैं अध्यक्ष होकर प्रकृतिसे सब चराचर सृष्टि उत्पन्न करवाता हूँ । हे कौन्तेय ! इस कारण जगतका यह बनना - बिगड़ना हुआ करता है। [पिछले अध्यायमें बतला चुके हैं, कि ब्रह्मदेवके दिनका (कल्पका) आरंभ होतेही अव्यक्त प्रकृतिसे व्यक्त-सृष्टि बनने लगती है (गी. ८. १८)। यहाँ इसी बातका अधिक स्पष्टीकरण किया है, कि परमेश्वर प्रत्येकके कर्मानुसार
७५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ § § महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ | उसे भला-बुरा जन्म देता है, अतएव वह स्वयं इन कर्मोंमें अलिप्त है। शास्त्रीय | प्रतिपादनमें ये सभी तत्त्व एकही स्थानमें बतला दिये जाने; परंतु गीताकी पद्धति | संवादात्मक है, इस कारण प्रसंगके अनुसार एकही विषय, थोड़ा-सा यहाँ और | थोड़ा-सा वहाँ, इस प्रकार वर्णित है। कुछ लोगोंकी दलील है, कि दसवें | श्लोकके 'जगद्विपरिवर्तते' पद विवर्तवादको सूचित करते हैं। परंतु "जगतका | बननाबिगड़ना हुआ करता है" अर्थात् "व्यक्तका अव्यक्त और फिर अव्यक्तका | व्यक्त होता रहता है," हम नहीं समझते, कि इसकी अपेक्षा 'विपरिवर्तते' पदका | कुछ अधिक अर्थ हो सकता है, और शांकरभाष्यमेंभी कोई विशेष अर्थ नहीं | बतलाया गया है। गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें विवेचन किया गया है, कि | मनुष्य कर्ममें अवश कैसे होता है :- ] (११) मूढ़ लोग मेरे उस परम स्वरूपको नहीं जानते, कि जो सब भूतोंका महान् ईश्वर है। मनुष्यकी देह धारण करनेसे (वे मुझ) मानव-तनुधारी ..... कर, मेरी अवहेलना करते हैं। (१२) उनकी आशाएँ व्यर्थ, कर्म फिजूल, ज्ञान निरर्थक और चित्त भ्रष्ट हैं और वे मोहात्मक राक्षसी तथा आसुरी स्वभावका आश्रय किये रहते हैं। [ यह आसुरी पुरुषका वर्णन है। अब दैवी स्वभावका वर्णन करते हैं :- ] (१३) परंतु हे पार्थ ! दैवी प्रकृतिका आश्रय करनेवाले महात्मा लोग सब भूतोंके अव्यय आदिस्थान मुझको पहचान कर अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं; (१४) और यत्नशील, दृढ़व्रत एवं नित्य योगयुक्त होकर सदा मेरा कीर्तनकर और वंदना करते हुए भक्तिसे मेरी उपासना किया करते हैं। (१५) ऐसेही और
नवां अध्याय ७५७ § § अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ॥ वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ कुछ लोग एकत्वसे अर्थात् अभेदभावमे, पृथक्त्वमे अर्थात् भेदभावमे, या अनेक भांतिके ज्ञानयज्ञसे यजनकर सर्वतोमुख मेरी उपासना किया करते हैं। | [ संसारमें पाये जानेवाले दैवी और राक्षसी स्वभावोंके पुरुषोंका यहाँ | जो संक्षिप्त वर्णन है, उसका विस्तार आगे सोलहवें अध्यायमे किया गया है। | पहले बतलाही चुके हैं, कि ज्ञान-यज्ञका अर्थ "परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञानसेही | आकलन करके, उसके द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लेना है" (गीता ४. ३३ की | टिप्पणी देखो)। किंतु परमेश्वरका यह ज्ञानभी द्वैत-अद्वैत आदि भेदोंसे अनेक | प्रकारका हो सकता है, इस कारण ज्ञानयज्ञभी भिन्न भिन्न प्रकारोंसे हो सकते | हैं इस प्रकार यद्यपि ज्ञानयज्ञ अनेक हों, तोभी पन्द्रहवें श्लोकका तात्पर्य यह है, | कि परमेश्वरके विश्वतोमुख होनेके कारण ये सब यज्ञ उसे ही पहुँचते हैं। | 'एकत्वसे', 'पृथक्त्व' आदि पदोंसे प्रकट है, कि द्वैत-अद्वैतसे, विशिष्टाद्वैत आदि | संप्रदाय यद्यपि अर्वाचीन हैं, तथापि ये कल्पनाएँ प्राचीन हैं। इस श्लोकमें | परमेश्वरका जो एकत्व और पृथक्त्व बतलाया गया है, उसीका अब अधिक | निरूपण कर बतलाते हैं, कि पृथक्त्वमें एकत्व क्या है :- ] (१६) क्रतु अर्थात् श्रौतयज्ञ मैं हूँ, यज्ञ अर्थात् स्मार्तयज्ञ मैं हूँ, स्वधा अर्थात् श्राद्धमें पितरोंको अर्पण किया हुआ अन्न मैं हूँ, औषध अर्थात् वनस्पतिसे (यज्ञके अर्थ) उत्पन्न हुआ अन्न मैं हूँ, (यज्ञमे हवन करतेसमय पढ़े जानेवाले) मन्त्र मैं हूँ, घृत, मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और (अग्निमे छोड़ी हुई) आहुति मैंही हूँ। | [ मूलमें क्रतु और यज्ञ, दोनों शब्द समानार्थकही हैं। परंतु जिस प्रकार | 'यज्ञ' शब्दका अर्थ आगे व्यापक हो गया और देवपूजा, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार, | प्राणायाम एवं जप इत्यादि कर्मोंकोभी 'यज्ञ'ही कहने लगे (गीता ४. २३- | ३०), उस प्रकार 'क्रतु' शब्दका अर्थ बढ़ने नहीं पाया। श्रौत-धर्ममें अश्वमेध | आदि जिन यज्ञोंके लिये यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका वही अर्थ आगेभी स्थिर | रहा है। अतएव शांकरभाष्यमे कहा है, कि इस स्थलपर 'क्रतु' शब्दसे 'श्रौत', | यज्ञ और 'यज्ञ' शब्दसे 'स्मार्त' यज्ञ समझना चाहिये; और ऊपर हमने यही अर्थ | किया है। क्योंकि ऐसा भेद न करें, तो 'क्रतु' और 'यज्ञ' शब्द समानार्थक होकर | इस श्लोकमें उनकी अकारण द्विरुक्ति करनेका दोष लगता है।] (१७) इस जगतका पिता, माता, धाता, '(आधार), पितामह (बाबा) मैं हूँ, जो
७५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥ कुछ पवित्र या जो कुछ ज्ञेय है, वह और ॐकार, ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेदभी मैं हूँ, (१८) (सबकी) गति, (सबका) पोषक, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सखा, उत्पत्ति, प्रलय, स्थिति, निधान और अव्यय बीजभी मैं हूँ। (१९) हे अर्जुन ! मैं उष्णता देता हूँ, मैं पानीको रोकता और बरसाता हूँ; अमृत और मृत्यु, (ऐसेही) सत् और असत्भी मैं हूँ। [ परमेश्वरके स्वरूपका ऐसाही वर्णन फिर विस्तारसहित १०, ११ और १२, अध्यायोंमें है। तथापि वहाँ केवल विभूति न बतलाकर यह विशेषता दिखलाई है, कि परमेश्वरका और जगतके भूतोंका संबंध माँ-बाप, मित्र इत्यादिके समान है, इन दो स्थानोंके वर्णनोंमें यही भेद है। ध्यान रहे, कि पानीको बरसाने और रोकनेमेंसे एक क्रिया चाहे हमारी दृष्टिसे फायदेकी और नुकसानकी हो, तथापि तात्त्विक दृष्टिसे दोनोंको परमेश्वरही करता है। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर भगवानने पहले (गीता ७. १२) कहा है, कि सात्त्विक, राजस और तामस, ये सब पदार्थ मैंही उत्पन्न करता हूँ; और आगे चौदहवें अध्यायमे इस बातका विस्तारसहित वर्णन किया है, कि गुणत्रय- विभागसे सृष्टिमें नानात्व कैसे उत्पन्न होता है। इस दृष्टिसे देखनेपर कैसे १९ वें श्लोकके सत् और असत् पदोंका क्रमसे ‘भला’ और ‘बुरा’ कैसे अर्थ किया जा सकेगा; और आगे गीतामें (गीता १३. २६-२८) एक बार ऐसा अर्थ कियाभी गया है परंतु जान पड़ता है, कि इन शब्दोंके, सत् = अविनाशी और असत् = विनाशी या नाशवान्, ये जो सामान्य अर्थ हैं, (गीता २. १६), वही इस स्थानमें अभीष्ट होंगे; और 'मृत्यु और अमृत' के समान 'सत् और असत्' ये द्वंद्वात्मक शब्द ऋग्वेदके नासदीय सूक्तसे सूझ पड़े होंगे। तथापि दोनोंमें यह भेद है, कि नासदीय सूक्तमें ‘सत्' शब्दका उपयोग दृश्यसृष्टिके लिये किया गया है और गीता 'सत्' शब्दका उपयोग परब्रह्मके लिये करती है, एवं दृश्य-सृष्टिको असत् कहती है (गीतार. प्र. ९, पृ. २४५-२४७)। किंतु इस प्रकार परिभाषाका यदि भेद हो, तोभी ‘सत्’ और ‘असत्’ इन दोनों शब्दोंकी एक साथ योजनासे प्रकट हो जाता है, कि उनमें दृश्य-सृष्टि और परब्रह्म इन दोनोंकाभी एकत्र समावेश होता है। अतः उक्त वर्णनसे यह भावार्थभी निकाला जा सकेगा, कि परिभाषाके भेद किसीकोभी 'सत्' और 'असत्' कहा जाय;
नवाँ अध्याय ७५९ § § त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ [ किंतु यह दिखलानेके लिये, कि दोनों परमेश्वरकेही रूप हैं, भगवानने 'सत्' और | 'असत्' शब्दोंकी व्याख्या न देकर सिर्फ यह वर्णन कर दिया है, कि 'सत्' और | 'असत्' मैंही हूँ ( गीता ११. ३७ ; १३. १२ ) । इस प्रकार यद्यपि परमेश्वरके | रूप अनेक हों, तथापि अब बतलाते हैं, कि उनकी एकत्वसे उपासना करने | और अनेकत्वसे उपासना करनेमें क्या भेद है :- ] (२०) जो त्रैविद्य अर्थात् ऋक्, यजु और साम इन तीन वेदोंके कर्म करने- वाले, सोम पीनेवाले अर्थात् सोमयाजी, तथा निष्पाप (पुरुष) यज्ञसे मेरी पूजा करके स्वर्गलोक-प्राप्तिकी इच्छा करते हैं, वे इंद्रके पुण्यलोकमें पहुँचकर स्वर्गमें देवताओंके अनेक दिव्य भोग भोगते हैं । (२१) और उस विशाल स्वर्गलोकका उपभोग करके पुण्यका क्षय हो जानेपर, वे ( फिर जन्म लेकर ) मृत्युलोकमें आते हैं। इस प्रकार त्रयी-धर्म अर्थात् तीनों वेदोंके यज्ञयाग आदि श्रौत-धर्मके पालनेवाले और काम्य उपभोगकी इच्छा करनेवाले लोगोंको ( स्वर्गका ) आवागमन प्राप्त होता है। | [ यह सिद्धान्त पहले कई वार आ चुका है, कि यज्ञयाग आदि धर्मसे | या नाना प्रकारके देवताओंकी आराधनासे कुछ समयतक स्वर्गवास मिल जाय , | तोभी पुण्यांश चूक जानेपर फिर जन्म लेकरके भूर्लोकमें आना पड़ता है ( गीता | २. ४२-४४ ; ४. ३४ ; ६. ४१ ; ७. २३ ; ८. १६, २५ ) । परंतु मोक्षमें वह | झंझट नहीं है; वह नित्य है, अर्थात् एक बार परमेश्वरको पा लेनेपर फिर | जन्म-मरणके चक्करमें नहीं आना पडता । महाभारतमें ( वन. २६० ) स्वर्ग- | सुखका जो वर्णन है, वहभी ऐसाही है। परंतु यज्ञयाग आदिसेही पर्जन्य प्रवृत्तिकी | उत्पत्ति होती है, अतएव शंका होती है, कि उनको छोड़ देनेसे इस जगतका | योगक्षेम अर्थात् निर्वाह कैसे होगा ? ( गीता २. ४५ की टिप्पणी ; गीतार. | प्र. १०, पृ. २९४ ) इसलिये अब ऊपरके श्लोकोंसे मिला करही उसका उत्तर | देते हैं :- ] (२२) जो अनन्यनिष्ठ लोग मेरा चिंतनकर मुझे भजते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंका योगक्षेम मैं किया करता हूँ ।
७६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥ [ न मिली हुई वस्तुका मिलना योग है, और मिली हुई वस्तुकी रक्षा करना क्षेम है; शाश्वतकोशमेंभी (श्लोक १००, २९२) योगक्षेमकी ऐसीही व्याख्या है, और उसका गूढ़ अर्थ 'सांसारिक नित्य निर्वाह' है। गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३८४-३८५) इसका विचार किया गया है, कि कर्मयोग-मार्गमें इस श्लोकका क्या अर्थ होता है; इसी प्रकार नारायणीय धर्ममेंभी (मभा. शां. ३४८. ७२) कहा है, कि- मनीषिणो हि ये केचित् यतयो मोक्षधर्मिणः । तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥ वहां यह वर्णन है, कि ये पुरुष एकान्तभक्त हों, तोभी प्रवृत्ति-मार्गके हैं, अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेवाले हैं। अब बतलाते हैं, कि परमेश्वरकी बहुत्वसे सेवा करनेवालोंकी अंतमें कौन गति होती है:- ] (२३) हे कौन्तेय ! श्रद्धायुक्त होकर अन्य देवताओंके भक्त बन करके जो लोग यजन करते हैं, वेभी विधिपूर्वक न हों, तोभी (पर्यायमे) मेराही यजन करते हैं; (२४) क्योंकि सब यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी मैंही हूँ। किंतु वे तत्त्वतः मुझे नहीं जानते इसलिये वे गिर जाया करते हैं। [ गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें (पृ ४०२-४०६) यह विवेचन है, कि इन दोनों श्लोकोंके सिद्धान्तका महत्त्व क्या है। वैदिक धर्ममें यह तत्त्व बहुत पुराने समयसे चला आ रहा है, कि कोईभी देवता हो, वह भगवानकाही एक स्वरूप है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेदमेंही कहा है, कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः"। (ऋ. १. १६४. ४६) - परमेश्वर एक है, परंतु पंडित लोग उसको अग्नि, यम, मातरिश्वा (वायु) कहा करते हैं; और इसके अनुसारही आगेके अध्यायमे परमेश्वरके एक होनेपरभी उसकीही अनेक विभूतियोंका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार महाभारतके अंतर्गत नारा- यणीयोपाख्यानमें चार प्रकारके भक्तोंमें कर्म करनेवाले एकांतिक भक्तको श्रेष्ठ (गीता ७. १९ की टिप्पणी) बतलाकर कहा है :- ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः । प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत्परम् ॥
नवाँ अध्याय ७६१ यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ २५ ॥ । "ब्रह्माको, शिवको, अथवा अन्य देवताओंको भजनेवाले साधु पुरुषभी मुझमेंही । आ मिलते हैं" (मभा. शां. ३४१. ३५); और गीताके उक्त श्लोकोंका अनुवाद । भागवतपुराणमेंभी किया गया है (भाग. १०, पू. ४०. ८-१०) । इसी प्रकार । नारायणीयोपाख्यानमें आगे फिर कहा है :- । ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंचैवातिथींस्तथा । । गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं तथा ॥ । कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते । । "देव, पितर, गुरु, अतिथि, ब्राह्मण और गौ प्रभृतिकी सेवा करनेवाले पर्यायसे । विष्णुकाही यजन करते हैं" (मभा. शां. ३४५. २६, २७) । इस प्रकार । भागवत धर्मके स्पष्ट कहनेपरभी, कि भक्तिको मुख्य मानो । देवतारूप प्रतीक । गौण है, अथवा यद्यपि विधिभेद हो, तथापि उपासना तो एकही परमेश्वरकी । होती है; यह बड़े आश्चर्यकी बात है, कि भागवत धर्मवालेभी शैवोंसे झगड़ा । किया करें ! अब बतलाते हैं, कि यद्यपि यह सिद्धान्त सत्य है, कि किसीभी । देवताकी उपासना क्यों न करें, पर वह पहुँचती है, भगवानकोही; तथापि यह । ज्ञान न होनेसे, कि सभी देवता एकही हैं, मोक्षकी राह छूट जाती है, और । भिन्न भिन्न देवताओंके उपासकोंको उनकी भावनाके अनुसार भगवान्ही भिन्न । भिन्न फल देते हैं :- ] (२५) देवताओंका व्रत करनेवाले देवताओंके पास, पितरोंका व्रत करनेवाले पितरोंके पास, (भिन्न-भिन्न) भूतोंको पूजनेवाले (उन) भूतोंके पास जाते हैं, और मेरा यजन करनेवाले मेरे पास आते हैं। । [ सारांश, यद्यपि एकही परमेश्वर सर्वत्र समाया हुआ है, तथापि उपास- । नाका फल प्रत्येकके भावके अनुरूप न्यूनाधिक योग्यताका मिला करता है। । फिरभी इस पूर्व-कथनको भूल न जाना चाहिये, कि फल-दानका कार्यभी देवता । नहीं करते, परमेश्वरही करता है, (गीता ७. २०-२३) । ऊपर २४ वें श्लोकमें । भगवान्ने यह कहा है, कि "सब यज्ञोंका भोक्ता मैंही हूँ", उसका तात्पर्य यही । है। महाभारतमेंभी कहा है :- । यस्मिन् यस्मिंश्च विषये योयो याति विनिश्चयम् । । स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ । "जो पुरुष जिस भावमें निश्चय रखता है, वह उस भावके अनुरूपही फल । पाता है" (शां. ३५२. ३) ; और यह श्रुतिभी है "यं यथा यथोपासते तदेव
७६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ § § यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥ । भवति ” ( गीता ८. ६ की टिप्पणी देखो ) नानात्वसे अर्थात् अनेक देवताओंकी । उपासना करनेवालोंको जो फल मिलता है, उसे पहले चरणमें बतलाकर दूसरे । चरणमें यह अर्थ वर्णन किया है, कि अनन्यभावसे भगवान्की भक्ति करनेवालों- । कोही सच्ची भगवत्प्राप्ति होती है। अब भक्ति-मार्गका यह महत्त्वका तत्त्व । बतलाते हैं, कि भगवान् इस ओर न देखकर कि मेरा भक्त, मुझे क्या समर्पण । करता है ? केवल उसके भावकीही ओर दृष्टि दे करके उसकी भक्ति स्वीकार । करते हैं :- ] (२६) जो मुझे भक्तिसे एक-आध पत्र, पुष्प, फल अथवा ( यथाशक्ति ) थोड़ासा जलभी अर्पण करता है, उस प्रयतात्म अर्थात् नियतचित्त पुरुषकी भक्तिकी उस भेंटको मैं ( आनंदसे ) ग्रहण करता हूँ । । [ कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है ( गीता २. ४९ ) – कर्मयोगके इस तत्त्व । केही भक्ति-मार्गके रूपांतरका वर्णन उक्त श्लोकमें है ( गीतार. प्र. १५, पृ. । ४७५-४७७ ) । इस विषयमें सुदामाके तंदुलोंकी कथा प्रसिद्ध है, और यह । श्लोक भागवत-पुराणके सुदामा-चरित्रके उपाख्यानमेंही आया है ( भाग. १० । उ. ८१. ४ ) । इसमें संदेह नहीं, कि पूजाके द्रव्य अथवा सामग्रीका न्यूनाधिक । होना सर्वथा और सर्वदा मनुष्यके बसकी बात नहीं होती । इसीसे शास्त्रमें । कहा है, कि यथाशक्ति प्राप्त होनेवाले स्वल्प पूजा-द्रव्यसेही नहीं, प्रत्युत शुद्ध । भावसे समर्पण किये गये मानसिक पूजा-द्रव्योंसेभी भगवान् संतुष्ट हो जाते हैं । । देवता है भावका भूखा; न कि पूजांकी सामग्रीका । मीमांसक-मार्गकी अपेक्षा । भक्ति-मार्गमें जो कुछ विशेषता है, वह यही है । यज्ञयाग करनेके लिये बहुत-सी । सामग्री जुटानी पड़ती है और उद्योगभी बहुत करना पड़ता है; परंतु भक्ति-यज्ञ । एक तुलसीदलसेभी हो जाता है । महाभारतमें कथा है, कि जब दुर्वासी ऋषि । घरपर आये, तब द्रौपदीने इसी प्रकारके यज्ञसे भगवान्को संतुष्ट किया था । । भगवद्भक्त जिस प्रकार अपने कर्म करता है, अर्जुनको उसी प्रकार करनेका । उपदेश देकर अब बतलाते हैं, कि उससे क्या फल मिलता है :- ] (२७) हे कौंतेय ! तू जो (कुछ) करता है, जो खाता है, जो होम-हवन करता है, जो दान करता है, (और) जो तप करता है, वह (सब) मुझे अर्पण किया
नवाँ अध्याय ७६३ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ § § समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥ कर। (२८) इस प्रकार बर्तनेसे (कर्म करकेभी) कर्मोंके शुभ-अशुभ फलरूप बंधनोंसे तू मुक्त रहेगा, और (कर्मफलोंके) संन्यास करनेके इस योगसे युक्तात्मा अर्थात् शुद्ध अंतःकरण हो कर मुक्त हो जायगा, एवं मुझमें मिल जायगा। । [ इससे प्रकट होता है, कि भगवद्भक्तभी कृष्णार्पण-बुद्धिसे समस्त कर्म । करे, उन्हें छोड़ न दे; और इस दृष्टिसे ये दोनों श्लोक महत्त्वके हैं। “ब्रह्मार्पणं । ब्रह्म हविः” (गीता ४. २४) यह ज्ञान-यज्ञका तत्त्वही अब भक्तिकी परिभाषाके । अनुसार २७ वें श्लोकमें बतलाया है (गीतार. प्र. १३, पृ. ४३२, ४३३) । । तीसरेही अध्यायमें अर्जुनसे कह दिया है, कि “मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य” । (गीता ३. ३०) - मुझमें सब कर्मोंका संन्यास करके - युद्ध कर; और पाँचवें । अध्यायमें फिर कहा है, कि “ब्रह्ममें कर्मोंको अर्पण करके संगरहित कर्म । करनेवालेको कर्मका लेप नहीं लगता” (५. १०)। गीताके मतानुसार यही । यथार्थ संन्यास है (गीता १८. २), और इस प्रकार अर्थात् कर्मफलाशा । छोड़कर (संन्यस्य) सब कर्मोंको करनेवाला पुरुषही 'नित्यसंन्यासी' है (गीता । ५. ३); कर्मत्यागरूप संन्यास गीताको संमत नहीं है। पीछे अनेक स्थलों- । पर कह चुके हैं, कि इस रीतिसे किये हुए कर्म मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते । (गीता २. ६४; ३. १९; ४. २३; ५. १२; ६. १; ८. ७), और इस २८ वें । श्लोकमें उसी बातको फिर कहा है। भागवत-पुराणमेंही नृसिंहरूपी भगवानने । प्रल्हादको यह उपदेश किया है कि “मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्परः”- । मुझमें चित्त लगाकर सब काम किया कर (भाग. ७. १०. २३); और आगे । एकादश स्कन्धमें भक्तियोगका यह तत्त्व बतलाया है, कि भगवद्भक्त सब कर्मोंको । नारायणार्पण कर दे (भाग. ११. २. २६; ११. ११. २४)। इस अध्यायके । आरंभमें वर्णन किया है, कि भक्तिका मार्ग सुखकारक और सुलभ है। अब उसके । समत्वरूपी दूसरे बड़े और विशेष गुणका वर्णन करते हैं :-] (२९) मैं सब भूतोंको एक-सा हूँ। न मुझे (कोई) द्वेष्य अर्थात् अप्रिय है, और न (कोई) प्यारा। भक्तिसे जो मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं, और मैंभी उनमें हूँ। (३०) बड़ा दुराचारीही क्यों न हो, यदि वह मुझे अनन्यभावसे भजता है,
७६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥ तो उसे साधुही समझना चाहिये। क्योकि उसकी बुद्धिका निश्चय अच्छी तरह हुआ है। (३१) वह जल्दी धर्मात्मा हो जाता है और नित्य शांति पाता है। हे कौंतेय ! तू भली भाँति समझे रह, कि मेरा भक्त (कभीभी) नष्ट नहीं होता । | [ तीसवें श्लोकका भावार्थ ऐसा न समझना चाहिये, कि भगवद्भक्त | यदि दुराचारी हो, तोभी व भगवान्को प्यारेही रहते हैं। भगवान् इतनाही कहते | हैं, कि पहले कोई मनुष्य दुराचारीभी रहा हो, परंतु जब एक बार उसकी बुद्धि | निश्चयमे परमेश्वराभिमुखका भजन करनेमे हो जाती है, तब आगे उसके हाथसे | कोईभी दुष्कर्म नहीं हो सकता; और फिर वह धीरे धीरे धर्मात्मा हो कर सिद्धि | पाता है, तथा अन्तमें इस सिद्धिस उसके पापका बिलकुल नाश हो जाता है। | सारांश, छठे अध्यायमें (६.४४) जो यह सिद्धान्त किया हे, कि कर्मयोगके | जाननेकी सिर्फ़ इच्छा होनेसेही कोल्हूमें अवश होकर मनुष्य शब्द-ब्रह्मसे परे | चला जाता है, अब उसीही भक्ति-मार्गके लिये लागू कर दिखलाया है। अब इस | बातकोही अधिक स्पष्ट करते हैं, कि परमेश्वर सब भूतोंको एक-सा कैसे है:- ] (३२) क्योंकि, हे पार्थ ! मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र, (अथवा) अन्त्यज आदि जो पापयोनि हों, वेभी परम गति पाते हैं। (३३) फिर पुण्यवान् ब्राह्मणोंकी, मेरे भक्तोंकी, और राजर्षियों, (क्षत्रियौं) की बात क्या कहनी है ? तू इस अनित्य और असुख अर्थात् दुःखकारक मृत्युलोकमें है, इस कारण मेरा भजन कर। | [ ३२ वे श्लोकके 'पापयोनि' शब्दको स्वतंत्र न मानकर कुछ टीकाकार | कहते हैं, कि वह स्त्रियो, वैश्यों और शूद्रोंकोभी लागू है, क्योंकि पहले कुछ-न- | कुछ पाप किये बिना कोईभी स्त्री, वैश्य या शूद्रका जन्म नही पाता। उनके मतमें | पापयोनि शब्द साधारण है और ये स्त्री, वैश्य तथा शूद्र उसके भेद उदाहरणार्थ | दिये गये हैं। परंतु हमारी रायमें यह अर्थ ठीक नहीं है। आजकल राजदरबारमें | जिन्हें 'गुन्हेगार जाति' कहते हैं, पापयोनि शब्दसे उस प्रकारका अर्थ विवक्षित | है। इस लोकका सिद्धान्त यह है, कि उस जातिके लोगोंकोभी भगवद्भक्तिसे
नवाँ अध्याय ७६५ § § मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ ———————— | सिद्धि मिलती है। स्त्री, वैश्य और शूद्र इस वर्गके नहीं है, उन्हें मोक्ष मिलनेमें | इतनीही बाधा है, कि वे वेद सुननेके अधिकारी नहीं हैं। इसीसे भागवत-पुराणमें | कहा है, कि :- स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ | "स्त्रियों, शूद्रों अथवा कलियुगके नामधारी ब्राह्मणोंके कानोंमें वेद नहीं पहुँचते, | इस कारण उन्हें मूर्खतामे बचनेके लिये व्यासमुनिने कृपालु होकर उनके | कल्याणार्थही महाभारतकी - अर्थात् गीताकीभी - रचना की" ( भाग. १. ४. | २५ ) । भगवद्गीताके उक्त श्लोक कुछ पाठभेदसे अनुगीतामेंभी पाये जाते हैं | (मभा. अश्व. १९. ६१, ६२ ) । जातिका, वर्णका, स्त्री-पुरुष आदिका अथवा | काले-गोरे रंग प्रभृतिका कोईभी भेद न रखकर सबको एकही सद्गति देनेवाले | भगवद्भक्तिके इस राजमार्गका ठीक ठीक बड़प्पन इस देशकी - और विशेषतः | महाराष्ट्रकी - संतमंडलीके इतिहाससे किसीकोभी ज्ञात हो सकेगा । उल्लिखित | श्लोकका अधिक स्पष्टीकरण गीतारहस्यके प्र १३. पृ. ४३८-४४२ में किया है । | इस प्रकारके धर्मका आचरण करनेके विषयमें ३३ वें श्लोकके उत्तरार्धमें अर्जुनको | जो उपदेश किया गया है, अगले श्लोकमेंभी वही प्रचलित है । ] (३४) मुझमें मन लगाकर, मेरा भक्त हो, मेरा यजन-पूजन कर और मुझे नमस्कार कर, इस प्रकार मत्परायण होकर, योगका अभ्यास करनेसे मुझेही पावेगा। | [ वास्तवमें इस उपदेशका आरंभ ३३ वें श्लोकमेंही हो गया है । ३३ वें | श्लोकमे 'अनित्य' पद अध्यात्मशास्त्रके इस सिद्धान्तके अनुसार आया है, कि | प्रकृतिका फैलाव अथवा नामरूपात्मक दृश्य-सृष्टि अनित्य है और एक पर- | मन्माही नित्य है; और 'असुख' पदसे इस सिद्धान्तका अनुवाद किया गया है, | कि इस संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःख अधिक है । तथापि यह वर्णन अध्यात्मक | नहीं है, भक्ति-मार्गका है। अतएव भगवानने परब्रह्म अथवा परमात्मा शब्दका | प्रयोग न करके "मुझे भज, मुझमें मन लगा, मुझे नमस्कार कर", ऐसे व्यक्त- | स्वरूपके दर्शानेवाले प्रथम पुरुषका निर्देश किया है । भगवानका अंतिम कथन है,
७६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र | कि हे अर्जुन ! इस प्रकार भक्ति करके मत्परायण होता हुआ योग अर्थात् कर्म- | योगका अभ्यास करता रहेगा, (गीता ७. १ ) तो तू कर्मबंधनसे मुक्त हो करके | निःसंदेह मुझे पा लेगा । इसी उपदेशकी पुनरावृत्ति ग्यारहवें अध्यायके अंतमें की | गई है। समस्त गीताका रहस्यभी यही है। भेद इतनाही है, कि इस रहस्यको | एक बार अध्यात्म-दृष्टिसे और एक बार भक्ति-दृष्टिसे बतला दिया है। ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए – अर्थात् कहे हुए – उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग – अर्थात् कर्मयोग -- शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, राजविद्या-राजगुह्ययोग नामक नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
दसवाँ अध्याय ७६७ दशमोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥ यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ § § बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ दसवाँ अध्याय [ पिछले अध्यायमें कर्मयोगकी सिद्धिके लिये परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपकी उपासनाका जो राजमार्ग बतलाया गया है, उसीका वर्णन इस अध्यायमें हो रहा है, और अर्जुनके पूछनेपर, अंतमें परमेश्वरके अनेक व्यक्त रूपों अथवा विभूति- योंका, अंतमें वर्णन किया गया है । इस वर्णनको सुनकर अर्जुनके मनमें भगवानके प्रत्यक्ष स्वरूपको देखनेकी इच्छा हुई, अतः ११ वें अध्यायमें भगवानने उसे विश्वरूप दिखलाकर कृतार्थ किया है । ] श्रीभगवानने कहा :- ( १) हे महाबाहु ! ( मेरे भाषणसे ) संतुष्ट होनेवाले तुझसे, अब तेरे हितार्थ मैं फिर ( एक ) अच्छी बात कहता हूँ, उसे सुन । ( २ ) देवताओंके गण और महर्षिभी मेरी उत्पत्तिको नहीं जानते; क्योंकि देवताओं और महर्षिओका सब प्रकारसे मैंही आदिकरण ( हूँ ) । ( ३) जो जानता है, कि मैं ( पृथ्वी आदि सब ) लोगोंका बड़ा ईश्वर हूँ और मेरे जन्म तथा आदि नहीं हैं, मनुष्योंमें वही मोहविरहित हो कर सब पापोंसे मुक्त होता है । | [ ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें यह विचार पाया जाता है, कि भगवान् या | परब्रह्म देवताओंकेभी पहलेका है, देवता पीछेसे हुए ( गीतार. प्र. ९, पृ. २५६ ) । | इस प्रकार प्रस्तावना हो गई । अब भगवान् इसका निरूपण करते हैं, कि मैं | सबका महेश्वर कैसे हूँ :- ] (४) बुद्धि, ज्ञान, असंमोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव (उत्पत्ति), अभाव ( नाश ), भय, अभय,
७६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥ (५) अहिंसा, समता, तुष्टि ( संतोष ), तप, दान, यश, अयशके आदि अनेक प्रकारके प्राणिमात्रके भाव मुझसेही उत्पन्न होते हैं। । [ 'भाव' शब्दका अर्थ है 'अवस्था', 'स्थिति' या 'वृत्ति' और सांख्य- । शास्त्रमें उनका 'बुद्धिके भाव' एवं 'शारीरिक भाव' ऐसा भेद किया गया है। । सांख्यशास्त्री पुरुषको अकर्ता और बुद्धिको प्रकृतिका एक विकार मानते हैं, इस- । लिये वे कहते हैं, कि लिंग-शरीरको पशु-पक्षी आदिके भिन्न भिन्न जन्म मिलनेका । कारण लिंग-शरीरमें रहनेवाली बुद्धिकी विभिन्न अवस्थाएँ अथवा भावही हैं । (गीतार. प्र. ८, पृ. १८९; सां. का. ४०-५५); और ऊपरके दो श्लोकोंमें उन्हीं । भावोंका वर्णन है। परंतु वेदान्तियोंका सिद्धान्त है, कि प्रकृति और पुरुषसेभी । परे परमात्मारूपी एक नित्य तत्त्व है और नासदीय सूक्तके वर्णनानुसार उसीके । मनमें सृष्टि निर्माण करनेकी इच्छा उत्पन्न होकर आगेपर सारा दृश्य जगत् । उत्पन्न होता है, इस कारण वेदान्तशास्त्रमेंभी कहा है, कि सृष्टिके मायात्मक सभी । पदार्थ परब्रह्मके मानस भाव हैं (अगला श्लोक देखो), तप, दान और यज्ञ आदि । शब्दोंसे तन्निष्ठ बुद्धिके भावही उद्दिष्ट हैं। भगवान् और कहते हैं, कि :-] (६) सात महर्षि, पहलेके चार, और मनु, ये मेरेही मानस अर्थात् मनसे निर्माण किये हुए भाव हैं, कि जिनसे ( इस ) लोकमें यह प्रजा हुई है। । [ यद्यपि इस श्लोकके शब्द सरल हैं, तथापि जिन पौराणिक पुरुषोंको । उद्देश्य करके यह श्लोक कहा गया है, उनके संबंधमें टीकाकारोंमें बहुतही मतभेद । है। विशेषतः अनेकोंने इसका निर्णय कई प्रकारसे किया है, कि 'पहलेके' (पूर्व) । और 'चार' ( चत्वारः ) पदोंका अन्वय किन पदोंसे लगाना चाहिये। सात । महर्षि प्रसिद्ध हैं, परंतु ब्रह्माके एक कल्पमें चौदह मन्वन्तर ( गीतार. प्र. ८, पृ. । १९४ ) होते हैं और प्रत्येक मन्वंतरके मनु, देवता एवं सप्तर्षि भिन्न भिन्न होते । हैं ( हरिवंश १, ७; विष्णु. ३. १; मत्स्य. ९ )। इसीसे 'पहलेके' शब्दको सात । महर्षियोंका विशेषण मान कई लोगोंने ऐसा अर्थ किया है, कि आजकलके, अर्थात् । वैवस्वत मन्वंतरसे पहलेके, चाक्षुष मन्वंतरवाले सप्तर्षि यहाँ विवक्षित हैं। भृगु । आदि इन सप्तर्षियोंके नाम हैं - भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा । और सहिष्णु । किंतु हमारे मतमे यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योंकि, आजकलके । अर्थात् वैवस्वत अथवा जिस मन्वन्तरमें गीता कही गई, उससे, पहलेके मन्वंतर-
दसवाँ अध्याय ७६९
| वाले सप्तर्षि यहाँ बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं है, अतः वर्तमान मन्वंतर- | केही सप्तर्षि लेने चाहिये । महाभारतके शांतिपर्वके नारायणीयोपाख्यानमें इनके | ये नाम हैं – मरीचि, अंगिरस, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ (मभा. | शां. ३३५. २८, २९; ३४०. ६४, ६५); और हमारे मतसे येही यहाँपर | विवक्षित हैं। क्योंकि गीतामें नारायणीय अथवा भागवत धर्मही विधिसहित | प्रतिपाद्य है (गीतार. पृ. ८–९)। तथापि यहाँ इतना बतला देना आवश्यक | है, कि मरीचि आदि सप्तर्षियोंके उक्त नाम कहीं कहीं अंगिरसके बदले भृगुसे | दिये हुए पाये जाते हैं; और कुछ स्थानोंपर तो ऐसा वर्णन है, कि कश्यप, अत्रि, | भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ वर्तमान युगके सप्तर्षि | हैं (विष्णु. ३. १. ३२, ३३; मत्स्य ९. २७, २८; मभा. अनु. ९३. २१)। | मरीचि आदि ऊपर लिखे हुए सात ऋषियोंमेंही भृगु और दक्षको मिलाकर | विष्णु-पुराणमें (विष्णु. १. ७. ५, ६) नौ मानसपुत्रोंका और इन्हींमें फिर | नारदकोभी जोड़ कर मनुस्मृतिमें ब्रह्मदेवके दस मानसपुत्रोंका वर्णन है (मनु. | १. ३४, ३५); और इन मरीचि आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति भारतमें की गई है | (म.भा. अनु. ८५)। परंतु हमें अभी इतनाही देखना है, कि सात महर्षि कौन | कौन हैं, इस कारण इन नौ-दस मानसपुत्रोंका अथवा इनके नामोंकी व्युत्पत्तिका | यहाँ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रकट है कि, 'पहलेके' इस पदका | अर्थ 'पूर्व मन्वन्तरके सात महर्षि' लेंगा नहीं सकते। अब देखना है, कि 'पहलेके | चार' इन शब्दोंको मनुका विशेषण मानकर कई एकोंने जो अर्थ किया है, वह | कहाँ तक युक्तिसंगत है? कुल चौदह मन्वंतर हैं और इनके चौदह मनु हैं; | उनमें सात-सातके दो वर्ग हैं। पहले सातोंके नाम स्वायंभुव, स्वारोचिष, औत्तमी, | तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत हैं, तथा ये स्वायंभुव आदि मनु कहे जाते | हैं (मनु. १. ६२, ६३)। इनमेंसे छः मनु हो चुके और आजकल सातवाँ अर्थात् | वैवस्वत मनु चल रहा है। इसके समाप्त होनेपर आगे सात मनु आवेंगे (भाग. | ८. १३. ७), उनको सावर्णि मनु कहते हैं; उनके नाम हैं – सावर्णि, दक्षसावर्णि, | ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इंद्रसावर्णि (विष्णु. ३. २; | भाग. ८. १३; हरिवंश १. ७)। इस प्रकार प्रत्येक मनुके सात सात होनेपर | इस बातका कोई कारण नहीं बतलाया जा सकता, कि किसीभी वर्गके 'पहलेके' | अर्थात् पहले 'चार' ही गीतामें क्यों विवक्षित हों ? ब्रह्मांड-पुराणमें (४. १) | कथा है, कि सावर्णि मनुओंमेंसे पहले मनुको छोड़कर अगले चार अर्थात्-दक्ष-, | ब्रह्म-, धर्म- और रुद्रसावर्णि एकही समयमें उत्पन्न हुए; और इसी आधारसे | कुछ लोग कहते हैं, कि; ये चार सावर्णि मनुही गीतामें विवक्षित हैं। किंतु इस- | पर दूसरा आक्षेप यह है, कि ये सब सावर्णि मनु भविष्यमें होनेवाले हैं, इस कारण | “जिनसे इस लोकमें यह प्रजा हुई” यह भूतकालदर्शक अगला वाक्य भावी गी. र. ४९
७७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । सावर्णि मनुओंको लागू नहीं हो सकता। इसी प्रकार 'पहलेके चार' शब्दोंका । संबंध 'मनु' पदसे जोड़ देना ठीक नहीं है। अतएव कहना पड़ता है, कि 'पहलेके । चार' ये दोनों शब्द स्वतंत्र रीतिसे प्राचीन कालके किन्हीं चार ऋषियों अथवा । पुरुषोंका बोध कराते हैं। और ऐसा मान लेनेसे यह प्रश्न सहजही होता है, कि । ये पहलेके चार ऋषि या पुरुष कौन हैं ? जिन टीकाकारोंने इस श्लोकका ऐसा । अर्थ किया है, उनके मतमें सनक, सनंद, सनातन और सनत्कुमार (भाग. ३. । १२. ४) येही वे चार ऋषि हैं। किंतु इस अर्थपर आक्षेप यह है, कि यद्यपि ये । चारों ऋषि ब्रह्माके मानसपुत्र हैं, तथापि ये सभी जन्मसेही संन्यासी होनेके । कारण प्रजावृद्धि नहीं करते थे, इससे ब्रह्मा इनपर क्रुद्ध हो गये थे (भाग. ३. । १२; विष्णु. १. ७)। अर्थात् जिनसे इस लोकमें यह प्रजा हुई" - "येषां लोक । इमाः प्रजाः" यह वाक्य इन चार ऋषियोंको बिलकुलही उपयुक्त नहीं होता। । इसके अतिरिक्त पुराणोंमें यद्यपि यह वर्णन है, कि ये ऋषि चार थे; तथापि । भारतके नारायणीय अर्थात् भागवत धर्ममें कहा है, कि इन चारोंमें सन, कपिल । और सनत्सुजातको मिला लेनेसे जो सात ऋषि होते हैं, वे सातों ब्रह्माके मानस- । पुत्र हैं और पहलेसेही वे निवृत्ति-धर्मके थे (मभा. शां. ३४०. ६७; ६८)। इस । प्रकार सनक आदि ऋषियोंको सात मान लेनेसे कोई कारण नहीं दीख पड़ता, । कि उनमेंसे चारही यहाँ क्यों लिये जायें। फिर 'पहलेके चार' हैं कौन ? हमारे । मतमें इस प्रश्नका उत्तर नारायणीय अथवां भागवत धर्मकी पौराणिक कथाओंसेही । दिया जाना चाहिये। क्योंकि यह निर्विवाद है, कि गीतामें भागवत धर्महीका । प्रतिपादन किया गया है। अब यदि यह देखें, कि भागवत धर्ममें सृष्टिकी उत्पत्तिकी । कल्पना किस प्रकारकी थी, तो पता लगेगा, कि मरीचि आदि सात ऋषियोंके । पहले वासुदेव (आत्मा), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन), और अनिरुद्ध । (अहंकार) ये चार मूर्तियाँ उत्पन्न हो गई थीं, और कहा है, कि आगे इनमेंसे । पिछले अनिरुद्धसे अर्थात् ब्रह्मदेवसे मरीचि आदि पुत्र उत्पन्न हुए (मभा. शां. । ३३९. ३४-४०, ६०-७२; ३४०. २७-३१)। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और । अनिरुद्ध इन्हीं चार मूर्तियोंको 'चतुर्व्यूह' कहते हैं और भागवत धर्मके एक । पंथका मत है, कि ये चारों मूर्तियाँ स्वतंत्र थीं; तथा दूसरे कुछ लोग इनमेंसे तीन । अथवा दोकोही प्रधान मानते हैं। किंतु भगवद्गीताको ये कल्पनाएँ मान्य नहीं । हैं; और हमने गीतारहस्य प्र. ८, पृ. १९६ और परि. ५३९-५४० में दिखलाया । हैं, कि गीता एकव्यूह-पंथकी है, अर्थात् एकही परमेश्वरसे चतुर्व्यूह आदि सब । कुछकी उत्पत्ति मानती है। अतः व्यूहात्मक वासुदेव आदि मूर्तियोंको स्वतंत्र न । मानकर इस श्लोकमें दर्शाया है, कि ये चारों व्यूह एकही परमेश्वर अर्थात् । सर्वव्यापी वासुदेवके (गीता ७. १९) 'भाव' हैं। इस दृष्टिसे देखनेपर विदित । होगा, कि भागवत धर्मके अनुसार 'पहलेके चार' इन शब्दोंका उपयोग वासुदेव
दसवाँ अध्याय ७७१ §§ एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥ | आदि चतुर्व्यूहके लिये किया गया है, कि जो सप्तर्षियोंके पूर्व उत्पन्न हुए थे । | भारतमेंही लिखा है, कि भागवत धर्मके चतुर्व्यूह आदि भेद पहलेमेही प्रचलित | थे (मभा. शां. ३४८. ५७) । यह कल्पना कुछ हमारीही नई नहीं है । सारांश, | भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यानके अनुसार हमने इस श्लोकका अर्थ यों लगाया | है – 'सात महर्षि' अर्थात् मरीचि आदि; 'पहलेके चार' अर्थात् वासुदेव आदि | चतुर्व्यूह; और 'मनु' अर्थात् जो उस समयसे पहले हो चुके थे और वर्तमान, सब | मिला कर स्वायंभुव आदि सात मनु । अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार आदि चार | मूर्तियोंको परमेश्वरके पुत्र माननेकी कल्पना भारतके अन्य स्थानोंमेंभी पाई | जाती है ( मभा. शां. ३११. ७, ८ ) । परमेश्वरके भावोंका वर्णन हो चुका; अब | बतलाते हैं, कि इन्हें जानकर उपासना करनेसे क्या फल मिलता है :- ] (७) जो मेरी इस विभूति अर्थात् विस्तारके, और योग अर्थात् इस विस्तार करनेकी युक्ति या सामर्थ्यके तत्त्वको जानता है, उसे निस्संदेह स्थिर (कर्म-)योग प्राप्त होता है। (८) यह जानकर, कि मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ, और मुझसे सब वस्तुओंकी प्रवृत्ति होती है, ज्ञानी पुरुष भावयुक्त होते हुए मुझको भजते रहते हैं। (९) (वे) मुझमें मन जमाकर और प्राणोंको लगाकर, परस्पर बोध करते हुए एवं मेरी कथाएँ कहते हुए, ( उसीमें ) सदा संतुष्ट और रममाण रहते हैं। (१०) इस प्रकार सदैव युक्त होकर अर्थात् समाधानसे रह कर जो लोग मुझे प्रीतिपूर्वक भजते हैं, उनको मैंही ऐसी (समत्व-)बुद्धिका योग देता हूँ, कि जिससे वे मुझे पा लेंगे। (११) और उनपर अनुग्रह करनेके लियेही मैं उनके आत्मभाव अर्थात् अंतःकरणमें पैठकर तेजस्वी ज्ञानदीपसे ( उनके मनके ) अज्ञानमूलक अंधकारका नाश करता हूँ।
७७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्जुन उवाच । § § परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥ सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥ स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥ वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥ [ सातवें अध्यायमें कहा है, कि भिन्न भिन्न देवताओंकी श्रद्धाभी पर- मेश्वरही देता है ( ७. २१) । उसी प्रकार अब ऊपरके दसवें श्लोकमेंभी वर्णन है, कि भक्ति-मार्गमें लगे हुए मनुष्यकी समत्व-बुद्धिको उन्नत करनेका कामभी परमेश्वरही करता है; और पहले (गीता ६. ४४) यह जो वर्णन आया है, कि जब मनुष्यके मनमें एक बार कर्मयोगकी जिज्ञासा जागृत हो जाती है, तब कोल्हूमें धरे हुएके समान वह आप-ही-आप पूर्ण सिद्धिकी ओर खींचा चला जाता है, उसके साथ भक्ति-मार्गका यह सिद्धान्त समानार्थक है। ज्ञानकी दृष्टिसे अर्थात् कर्मविपाक-प्रक्रियाके अनुसार कहा जाता है, कि यह कर्तृत्व आत्माकी स्वतंत्रतासे मिलता है। पर आत्माभी तो परमेश्वरही है, इस कारण भक्ति-मार्गमें ऐसा वर्णन हुआ करता है, कि ये फल अथवा बुद्धि परमेश्वरही प्रत्येक मनुष्यके पूर्व- कर्मोंके अनुसार देता है (गीता ७. २०; गीतार. प्र. १३, पृ. ४२८) । इस प्रकार भगवानके भक्ति-मार्गका तत्त्व बतला चुकने पर :- ] अर्जुनने कहा :- (१२-१३) तुम्हीं परम ब्रह्म, श्रेष्ठ स्थान और परम पवित्र वस्तु (हो); सब ऋषि, ऐसेही देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यासभी तुमको दिव्य एवं शाश्वत पुरुष, आदिदेव, अजन्म, सर्वविभु अर्थात् सर्वव्यापी कहते हैं; और स्वयं तुमभी मुझसे वही कहते हो। (१४) हे केशव ! तुम मुझसे यह जो कहते हो, उस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन् ! तुम्हारी व्यक्ति अर्थात् तुम्हारा मूल देवताओंको विदित नहीं और दानवोंको विदित नहीं । (१५) सब भूतोंके उत्पन्न करनेवाले हे भूतेश ! हे देवदेव जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! तुम स्वयंही अपने आपको जानते हो। (१६) अतः तुम्हारी जो दिव्य विभूतियां हैं,
दसवाँ अध्याय ७७३ कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥ विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ श्रीभगवानुवाच । §§ हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥ जिन विभूतियोंसे इन सब लोकोंको तुम व्याप्तकर रहे हो, उन्हें आप-ही (कृपा कर) मुझे पूर्णतासे बतलावें । (१७) हे योगिन् ! (मुझे यह बतलाइये, कि) सदा तुम्हारा चिंतन करता हुआ मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ; और हे भगवन् ! मैं किन किन पदार्थोंमें तुम्हारा चिंतन करूँ ? (१८) हे जनार्दन ! अपनी विभूति और योग मुझे फिर विस्तारसे बतलाओ, क्योंकि अमृततुल्य (तुम्हारे इस भाषणको) सुनते सुनते मेरी तृप्ति नहीं होती । | [ विभूति ओर योग, ये दोनों शब्द इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें आये | हैं। और यहाँ अर्जुनने उन्हींको दोहरा दिया है। 'योग' शब्दका अर्थ पहले | (गीता ७. २५) दिया जा चुका है, उसे देखो। भगवान्की विभूतियोंको अर्जुन | इसलिये नहीं पूछता, कि भिन्न भिन्न विभूतियोंका ध्यान देवता समझ कर किया | जावे; किंतु सत्रहवें श्लोकके इस कथनको स्मरण रखना चाहिये, कि उक्त | विभूतियोंमें सर्वव्यापी परमेश्वरकीही भावना रखनेके लिये पूछता है। क्योंकि | भगवान् यह पहलेही बतला चुके हैं (गीता ७. २०-२५; ९. २२-२८), कि | एकही परमेश्वरको सब स्थानोंमें विद्यमान जानना एक बात है, और परमेश्वरकी | भिन्न-भिन्न विभूतियोंको भिन्न-भिन्न देवता मानना दूसरी बात है; इन दोनोंमें | भक्ति-मार्गकी दृष्टिसे महान् अंतर है।] श्रीभगवानने कहा :- (१९) अच्छा; तो अब हे कुरुश्रेष्ठ ! अपनी दिव्य विभूतियोंमेंसे तुम्हें मुख्य मुख्य बतलाता हूँ; क्योकि मेरे विस्तारका अंत नहीं है। | [ इस विभूति-वर्णनके समानही महाभारतके अनुशासनपर्वमें (अनु. १४. | ३११-३३१) और अनुगीतामें (अश्व. ४३, ४४) परमेश्वरके रूपका वर्णन | है। परंतु गीताका वर्णन उसकी अपेक्षा अधिक सरस है, इस कारण उसीकी | पुनरुक्ति और स्थलोंमेंभी मिलती है। उदाहरणार्थ, भागवत-पुराणके एकादश | स्कंधके सोलहवें अध्यायमें इसी प्रकारका विभूति-वर्णन भगवानने उद्धवको