श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ § § महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ | उसे भला-बुरा जन्म देता है, अतएव वह स्वयं इन कर्मोंमें अलिप्त है। शास्त्रीय | प्रतिपादनमें ये सभी तत्त्व एकही स्थानमें बतला दिये जाने; परंतु गीताकी पद्धति | संवादात्मक है, इस कारण प्रसंगके अनुसार एकही विषय, थोड़ा-सा यहाँ और | थोड़ा-सा वहाँ, इस प्रकार वर्णित है। कुछ लोगोंकी दलील है, कि दसवें | श्लोकके 'जगद्विपरिवर्तते' पद विवर्तवादको सूचित करते हैं। परंतु "जगतका | बननाबिगड़ना हुआ करता है" अर्थात् "व्यक्तका अव्यक्त और फिर अव्यक्तका | व्यक्त होता रहता है," हम नहीं समझते, कि इसकी अपेक्षा 'विपरिवर्तते' पदका | कुछ अधिक अर्थ हो सकता है, और शांकरभाष्यमेंभी कोई विशेष अर्थ नहीं | बतलाया गया है। गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें विवेचन किया गया है, कि | मनुष्य कर्ममें अवश कैसे होता है :- ] (११) मूढ़ लोग मेरे उस परम स्वरूपको नहीं जानते, कि जो सब भूतोंका महान् ईश्वर है। मनुष्यकी देह धारण करनेसे (वे मुझ) मानव-तनुधारी ..... कर, मेरी अवहेलना करते हैं। (१२) उनकी आशाएँ व्यर्थ, कर्म फिजूल, ज्ञान निरर्थक और चित्त भ्रष्ट हैं और वे मोहात्मक राक्षसी तथा आसुरी स्वभावका आश्रय किये रहते हैं। [ यह आसुरी पुरुषका वर्णन है। अब दैवी स्वभावका वर्णन करते हैं :- ] (१३) परंतु हे पार्थ ! दैवी प्रकृतिका आश्रय करनेवाले महात्मा लोग सब भूतोंके अव्यय आदिस्थान मुझको पहचान कर अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं; (१४) और यत्नशील, दृढ़व्रत एवं नित्य योगयुक्त होकर सदा मेरा कीर्तनकर और वंदना करते हुए भक्तिसे मेरी उपासना किया करते हैं। (१५) ऐसेही और