श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 802, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवां अध्याय ७५७ § § अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ॥ वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ कुछ लोग एकत्वसे अर्थात् अभेदभावमे, पृथक्त्वमे अर्थात् भेदभावमे, या अनेक भांतिके ज्ञानयज्ञसे यजनकर सर्वतोमुख मेरी उपासना किया करते हैं। | [ संसारमें पाये जानेवाले दैवी और राक्षसी स्वभावोंके पुरुषोंका यहाँ | जो संक्षिप्त वर्णन है, उसका विस्तार आगे सोलहवें अध्यायमे किया गया है। | पहले बतलाही चुके हैं, कि ज्ञान-यज्ञका अर्थ "परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञानसेही | आकलन करके, उसके द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लेना है" (गीता ४. ३३ की | टिप्पणी देखो)। किंतु परमेश्वरका यह ज्ञानभी द्वैत-अद्वैत आदि भेदोंसे अनेक | प्रकारका हो सकता है, इस कारण ज्ञानयज्ञभी भिन्न भिन्न प्रकारोंसे हो सकते | हैं इस प्रकार यद्यपि ज्ञानयज्ञ अनेक हों, तोभी पन्द्रहवें श्लोकका तात्पर्य यह है, | कि परमेश्वरके विश्वतोमुख होनेके कारण ये सब यज्ञ उसे ही पहुँचते हैं। | 'एकत्वसे', 'पृथक्त्व' आदि पदोंसे प्रकट है, कि द्वैत-अद्वैतसे, विशिष्टाद्वैत आदि | संप्रदाय यद्यपि अर्वाचीन हैं, तथापि ये कल्पनाएँ प्राचीन हैं। इस श्लोकमें | परमेश्वरका जो एकत्व और पृथक्त्व बतलाया गया है, उसीका अब अधिक | निरूपण कर बतलाते हैं, कि पृथक्त्वमें एकत्व क्या है :- ] (१६) क्रतु अर्थात् श्रौतयज्ञ मैं हूँ, यज्ञ अर्थात् स्मार्तयज्ञ मैं हूँ, स्वधा अर्थात् श्राद्धमें पितरोंको अर्पण किया हुआ अन्न मैं हूँ, औषध अर्थात् वनस्पतिसे (यज्ञके अर्थ) उत्पन्न हुआ अन्न मैं हूँ, (यज्ञमे हवन करतेसमय पढ़े जानेवाले) मन्त्र मैं हूँ, घृत, मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और (अग्निमे छोड़ी हुई) आहुति मैंही हूँ। | [ मूलमें क्रतु और यज्ञ, दोनों शब्द समानार्थकही हैं। परंतु जिस प्रकार | 'यज्ञ' शब्दका अर्थ आगे व्यापक हो गया और देवपूजा, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार, | प्राणायाम एवं जप इत्यादि कर्मोंकोभी 'यज्ञ'ही कहने लगे (गीता ४. २३- | ३०), उस प्रकार 'क्रतु' शब्दका अर्थ बढ़ने नहीं पाया। श्रौत-धर्ममें अश्वमेध | आदि जिन यज्ञोंके लिये यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका वही अर्थ आगेभी स्थिर | रहा है। अतएव शांकरभाष्यमे कहा है, कि इस स्थलपर 'क्रतु' शब्दसे 'श्रौत', | यज्ञ और 'यज्ञ' शब्दसे 'स्मार्त' यज्ञ समझना चाहिये; और ऊपर हमने यही अर्थ | किया है। क्योंकि ऐसा भेद न करें, तो 'क्रतु' और 'यज्ञ' शब्द समानार्थक होकर | इस श्लोकमें उनकी अकारण द्विरुक्ति करनेका दोष लगता है।] (१७) इस जगतका पिता, माता, धाता, '(आधार), पितामह (बाबा) मैं हूँ, जो