भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 803

७५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥ कुछ पवित्र या जो कुछ ज्ञेय है, वह और ॐकार, ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेदभी मैं हूँ, (१८) (सबकी) गति, (सबका) पोषक, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सखा, उत्पत्ति, प्रलय, स्थिति, निधान और अव्यय बीजभी मैं हूँ। (१९) हे अर्जुन ! मैं उष्णता देता हूँ, मैं पानीको रोकता और बरसाता हूँ; अमृत और मृत्यु, (ऐसेही) सत् और असत्‌भी मैं हूँ। [ परमेश्वरके स्वरूपका ऐसाही वर्णन फिर विस्तारसहित १०, ११ और १२, अध्यायोंमें है। तथापि वहाँ केवल विभूति न बतलाकर यह विशेषता दिखलाई है, कि परमेश्वरका और जगतके भूतोंका संबंध माँ-बाप, मित्र इत्यादिके समान है, इन दो स्थानोंके वर्णनोंमें यही भेद है। ध्यान रहे, कि पानीको बरसाने और रोकनेमेंसे एक क्रिया चाहे हमारी दृष्टिसे फायदेकी और नुकसानकी हो, तथापि तात्त्विक दृष्टिसे दोनोंको परमेश्वरही करता है। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर भगवानने पहले (गीता ७. १२) कहा है, कि सात्त्विक, राजस और तामस, ये सब पदार्थ मैंही उत्पन्न करता हूँ; और आगे चौदहवें अध्यायमे इस बातका विस्तारसहित वर्णन किया है, कि गुणत्रय- विभागसे सृष्टिमें नानात्व कैसे उत्पन्न होता है। इस दृष्टिसे देखनेपर कैसे १९ वें श्लोकके सत् और असत् पदोंका क्रमसे ‘भला’ और ‘बुरा’ कैसे अर्थ किया जा सकेगा; और आगे गीतामें (गीता १३. २६-२८) एक बार ऐसा अर्थ कियाभी गया है परंतु जान पड़ता है, कि इन शब्दोंके, सत् = अविनाशी और असत् = विनाशी या नाशवान्, ये जो सामान्य अर्थ हैं, (गीता २. १६), वही इस स्थानमें अभीष्ट होंगे; और 'मृत्यु और अमृत' के समान 'सत् और असत्' ये द्वंद्वात्मक शब्द ऋग्वेदके नासदीय सूक्तसे सूझ पड़े होंगे। तथापि दोनोंमें यह भेद है, कि नासदीय सूक्तमें ‘सत्' शब्दका उपयोग दृश्यसृष्टिके लिये किया गया है और गीता 'सत्' शब्दका उपयोग परब्रह्मके लिये करती है, एवं दृश्य-सृष्टिको असत् कहती है (गीतार. प्र. ९, पृ. २४५-२४७)। किंतु इस प्रकार परिभाषाका यदि भेद हो, तोभी ‘सत्’ और ‘असत्’ इन दोनों शब्दोंकी एक साथ योजनासे प्रकट हो जाता है, कि उनमें दृश्य-सृष्टि और परब्रह्म इन दोनोंकाभी एकत्र समावेश होता है। अतः उक्त वर्णनसे यह भावार्थभी निकाला जा सकेगा, कि परिभाषाके भेद किसीकोभी 'सत्' और 'असत्' कहा जाय;