श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 804, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय ७५९ § § त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ [ किंतु यह दिखलानेके लिये, कि दोनों परमेश्वरकेही रूप हैं, भगवानने 'सत्' और | 'असत्' शब्दोंकी व्याख्या न देकर सिर्फ यह वर्णन कर दिया है, कि 'सत्' और | 'असत्' मैंही हूँ ( गीता ११. ३७ ; १३. १२ ) । इस प्रकार यद्यपि परमेश्वरके | रूप अनेक हों, तथापि अब बतलाते हैं, कि उनकी एकत्वसे उपासना करने | और अनेकत्वसे उपासना करनेमें क्या भेद है :- ] (२०) जो त्रैविद्य अर्थात् ऋक्, यजु और साम इन तीन वेदोंके कर्म करने- वाले, सोम पीनेवाले अर्थात् सोमयाजी, तथा निष्पाप (पुरुष) यज्ञसे मेरी पूजा करके स्वर्गलोक-प्राप्तिकी इच्छा करते हैं, वे इंद्रके पुण्यलोकमें पहुँचकर स्वर्गमें देवताओंके अनेक दिव्य भोग भोगते हैं । (२१) और उस विशाल स्वर्गलोकका उपभोग करके पुण्यका क्षय हो जानेपर, वे ( फिर जन्म लेकर ) मृत्युलोकमें आते हैं। इस प्रकार त्रयी-धर्म अर्थात् तीनों वेदोंके यज्ञयाग आदि श्रौत-धर्मके पालनेवाले और काम्य उपभोगकी इच्छा करनेवाले लोगोंको ( स्वर्गका ) आवागमन प्राप्त होता है। | [ यह सिद्धान्त पहले कई वार आ चुका है, कि यज्ञयाग आदि धर्मसे | या नाना प्रकारके देवताओंकी आराधनासे कुछ समयतक स्वर्गवास मिल जाय , | तोभी पुण्यांश चूक जानेपर फिर जन्म लेकरके भूर्लोकमें आना पड़ता है ( गीता | २. ४२-४४ ; ४. ३४ ; ६. ४१ ; ७. २३ ; ८. १६, २५ ) । परंतु मोक्षमें वह | झंझट नहीं है; वह नित्य है, अर्थात् एक बार परमेश्वरको पा लेनेपर फिर | जन्म-मरणके चक्करमें नहीं आना पडता । महाभारतमें ( वन. २६० ) स्वर्ग- | सुखका जो वर्णन है, वहभी ऐसाही है। परंतु यज्ञयाग आदिसेही पर्जन्य प्रवृत्तिकी | उत्पत्ति होती है, अतएव शंका होती है, कि उनको छोड़ देनेसे इस जगतका | योगक्षेम अर्थात् निर्वाह कैसे होगा ? ( गीता २. ४५ की टिप्पणी ; गीतार. | प्र. १०, पृ. २९४ ) इसलिये अब ऊपरके श्लोकोंसे मिला करही उसका उत्तर | देते हैं :- ] (२२) जो अनन्यनिष्ठ लोग मेरा चिंतनकर मुझे भजते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंका योगक्षेम मैं किया करता हूँ ।