श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥ [ न मिली हुई वस्तुका मिलना योग है, और मिली हुई वस्तुकी रक्षा करना क्षेम है; शाश्वतकोशमेंभी (श्लोक १००, २९२) योगक्षेमकी ऐसीही व्याख्या है, और उसका गूढ़ अर्थ 'सांसारिक नित्य निर्वाह' है। गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३८४-३८५) इसका विचार किया गया है, कि कर्मयोग-मार्गमें इस श्लोकका क्या अर्थ होता है; इसी प्रकार नारायणीय धर्ममेंभी (मभा. शां. ३४८. ७२) कहा है, कि- मनीषिणो हि ये केचित् यतयो मोक्षधर्मिणः । तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥ वहां यह वर्णन है, कि ये पुरुष एकान्तभक्त हों, तोभी प्रवृत्ति-मार्गके हैं, अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेवाले हैं। अब बतलाते हैं, कि परमेश्वरकी बहुत्वसे सेवा करनेवालोंकी अंतमें कौन गति होती है:- ] (२३) हे कौन्तेय ! श्रद्धायुक्त होकर अन्य देवताओंके भक्त बन करके जो लोग यजन करते हैं, वेभी विधिपूर्वक न हों, तोभी (पर्यायमे) मेराही यजन करते हैं; (२४) क्योंकि सब यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी मैंही हूँ। किंतु वे तत्त्वतः मुझे नहीं जानते इसलिये वे गिर जाया करते हैं। [ गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें (पृ ४०२-४०६) यह विवेचन है, कि इन दोनों श्लोकोंके सिद्धान्तका महत्त्व क्या है। वैदिक धर्ममें यह तत्त्व बहुत पुराने समयसे चला आ रहा है, कि कोईभी देवता हो, वह भगवानकाही एक स्वरूप है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेदमेंही कहा है, कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः"। (ऋ. १. १६४. ४६) - परमेश्वर एक है, परंतु पंडित लोग उसको अग्नि, यम, मातरिश्वा (वायु) कहा करते हैं; और इसके अनुसारही आगेके अध्यायमे परमेश्वरके एक होनेपरभी उसकीही अनेक विभूतियोंका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार महाभारतके अंतर्गत नारा- यणीयोपाख्यानमें चार प्रकारके भक्तोंमें कर्म करनेवाले एकांतिक भक्तको श्रेष्ठ (गीता ७. १९ की टिप्पणी) बतलाकर कहा है :- ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः । प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत्परम् ॥