भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 806

नवाँ अध्याय ७६१ यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ २५ ॥ । "ब्रह्माको, शिवको, अथवा अन्य देवताओंको भजनेवाले साधु पुरुषभी मुझमेंही । आ मिलते हैं" (मभा. शां. ३४१. ३५); और गीताके उक्त श्लोकोंका अनुवाद । भागवतपुराणमेंभी किया गया है (भाग. १०, पू. ४०. ८-१०) । इसी प्रकार । नारायणीयोपाख्यानमें आगे फिर कहा है :- । ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंचैवातिथींस्तथा । । गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं तथा ॥ । कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते । । "देव, पितर, गुरु, अतिथि, ब्राह्मण और गौ प्रभृतिकी सेवा करनेवाले पर्यायसे । विष्णुकाही यजन करते हैं" (मभा. शां. ३४५. २६, २७) । इस प्रकार । भागवत धर्मके स्पष्ट कहनेपरभी, कि भक्तिको मुख्य मानो । देवतारूप प्रतीक । गौण है, अथवा यद्यपि विधिभेद हो, तथापि उपासना तो एकही परमेश्वरकी । होती है; यह बड़े आश्चर्यकी बात है, कि भागवत धर्मवालेभी शैवोंसे झगड़ा । किया करें ! अब बतलाते हैं, कि यद्यपि यह सिद्धान्त सत्य है, कि किसीभी । देवताकी उपासना क्यों न करें, पर वह पहुँचती है, भगवानकोही; तथापि यह । ज्ञान न होनेसे, कि सभी देवता एकही हैं, मोक्षकी राह छूट जाती है, और । भिन्न भिन्न देवताओंके उपासकोंको उनकी भावनाके अनुसार भगवान्‌ही भिन्न । भिन्न फल देते हैं :- ] (२५) देवताओंका व्रत करनेवाले देवताओंके पास, पितरोंका व्रत करनेवाले पितरोंके पास, (भिन्न-भिन्न) भूतोंको पूजनेवाले (उन) भूतोंके पास जाते हैं, और मेरा यजन करनेवाले मेरे पास आते हैं। । [ सारांश, यद्यपि एकही परमेश्वर सर्वत्र समाया हुआ है, तथापि उपास- । नाका फल प्रत्येकके भावके अनुरूप न्यूनाधिक योग्यताका मिला करता है। । फिरभी इस पूर्व-कथनको भूल न जाना चाहिये, कि फल-दानका कार्यभी देवता । नहीं करते, परमेश्वरही करता है, (गीता ७. २०-२३) । ऊपर २४ वें श्लोकमें । भगवान्‌ने यह कहा है, कि "सब यज्ञोंका भोक्ता मैंही हूँ", उसका तात्पर्य यही । है। महाभारतमेंभी कहा है :- । यस्मिन् यस्मिंश्च विषये योयो याति विनिश्चयम् । । स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ । "जो पुरुष जिस भावमें निश्चय रखता है, वह उस भावके अनुरूपही फल । पाता है" (शां. ३५२. ३) ; और यह श्रुतिभी है "यं यथा यथोपासते तदेव