भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 807

७६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ § § यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥ । भवति ” ( गीता ८. ६ की टिप्पणी देखो ) नानात्वसे अर्थात् अनेक देवताओंकी । उपासना करनेवालोंको जो फल मिलता है, उसे पहले चरणमें बतलाकर दूसरे । चरणमें यह अर्थ वर्णन किया है, कि अनन्यभावसे भगवान्‌की भक्ति करनेवालों- । कोही सच्ची भगवत्प्राप्ति होती है। अब भक्ति-मार्गका यह महत्त्वका तत्त्व । बतलाते हैं, कि भगवान् इस ओर न देखकर कि मेरा भक्त, मुझे क्या समर्पण । करता है ? केवल उसके भावकीही ओर दृष्टि दे करके उसकी भक्ति स्वीकार । करते हैं :- ] (२६) जो मुझे भक्तिसे एक-आध पत्र, पुष्प, फल अथवा ( यथाशक्ति ) थोड़ासा जलभी अर्पण करता है, उस प्रयतात्म अर्थात् नियतचित्त पुरुषकी भक्तिकी उस भेंटको मैं ( आनंदसे ) ग्रहण करता हूँ । । [ कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है ( गीता २. ४९ ) – कर्मयोगके इस तत्त्व । केही भक्ति-मार्गके रूपांतरका वर्णन उक्त श्लोकमें है ( गीतार. प्र. १५, पृ. । ४७५-४७७ ) । इस विषयमें सुदामाके तंदुलोंकी कथा प्रसिद्ध है, और यह । श्लोक भागवत-पुराणके सुदामा-चरित्रके उपाख्यानमेंही आया है ( भाग. १० । उ. ८१. ४ ) । इसमें संदेह नहीं, कि पूजाके द्रव्य अथवा सामग्रीका न्यूनाधिक । होना सर्वथा और सर्वदा मनुष्यके बसकी बात नहीं होती । इसीसे शास्त्रमें । कहा है, कि यथाशक्ति प्राप्त होनेवाले स्वल्प पूजा-द्रव्यसेही नहीं, प्रत्युत शुद्ध । भावसे समर्पण किये गये मानसिक पूजा-द्रव्योंसेभी भगवान् संतुष्ट हो जाते हैं । । देवता है भावका भूखा; न कि पूजांकी सामग्रीका । मीमांसक-मार्गकी अपेक्षा । भक्ति-मार्गमें जो कुछ विशेषता है, वह यही है । यज्ञयाग करनेके लिये बहुत-सी । सामग्री जुटानी पड़ती है और उद्योगभी बहुत करना पड़ता है; परंतु भक्ति-यज्ञ । एक तुलसीदलसेभी हो जाता है । महाभारतमें कथा है, कि जब दुर्वासी ऋषि । घरपर आये, तब द्रौपदीने इसी प्रकारके यज्ञसे भगवान्‌को संतुष्ट किया था । । भगवद्भक्त जिस प्रकार अपने कर्म करता है, अर्जुनको उसी प्रकार करनेका । उपदेश देकर अब बतलाते हैं, कि उससे क्या फल मिलता है :- ] (२७) हे कौंतेय ! तू जो (कुछ) करता है, जो खाता है, जो होम-हवन करता है, जो दान करता है, (और) जो तप करता है, वह (सब) मुझे अर्पण किया