श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 808, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय ७६३ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ § § समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥ कर। (२८) इस प्रकार बर्तनेसे (कर्म करकेभी) कर्मोंके शुभ-अशुभ फलरूप बंधनोंसे तू मुक्त रहेगा, और (कर्मफलोंके) संन्यास करनेके इस योगसे युक्तात्मा अर्थात् शुद्ध अंतःकरण हो कर मुक्त हो जायगा, एवं मुझमें मिल जायगा। । [ इससे प्रकट होता है, कि भगवद्भक्तभी कृष्णार्पण-बुद्धिसे समस्त कर्म । करे, उन्हें छोड़ न दे; और इस दृष्टिसे ये दोनों श्लोक महत्त्वके हैं। “ब्रह्मार्पणं । ब्रह्म हविः” (गीता ४. २४) यह ज्ञान-यज्ञका तत्त्वही अब भक्तिकी परिभाषाके । अनुसार २७ वें श्लोकमें बतलाया है (गीतार. प्र. १३, पृ. ४३२, ४३३) । । तीसरेही अध्यायमें अर्जुनसे कह दिया है, कि “मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य” । (गीता ३. ३०) - मुझमें सब कर्मोंका संन्यास करके - युद्ध कर; और पाँचवें । अध्यायमें फिर कहा है, कि “ब्रह्ममें कर्मोंको अर्पण करके संगरहित कर्म । करनेवालेको कर्मका लेप नहीं लगता” (५. १०)। गीताके मतानुसार यही । यथार्थ संन्यास है (गीता १८. २), और इस प्रकार अर्थात् कर्मफलाशा । छोड़कर (संन्यस्य) सब कर्मोंको करनेवाला पुरुषही 'नित्यसंन्यासी' है (गीता । ५. ३); कर्मत्यागरूप संन्यास गीताको संमत नहीं है। पीछे अनेक स्थलों- । पर कह चुके हैं, कि इस रीतिसे किये हुए कर्म मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते । (गीता २. ६४; ३. १९; ४. २३; ५. १२; ६. १; ८. ७), और इस २८ वें । श्लोकमें उसी बातको फिर कहा है। भागवत-पुराणमेंही नृसिंहरूपी भगवानने । प्रल्हादको यह उपदेश किया है कि “मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्परः”- । मुझमें चित्त लगाकर सब काम किया कर (भाग. ७. १०. २३); और आगे । एकादश स्कन्धमें भक्तियोगका यह तत्त्व बतलाया है, कि भगवद्भक्त सब कर्मोंको । नारायणार्पण कर दे (भाग. ११. २. २६; ११. ११. २४)। इस अध्यायके । आरंभमें वर्णन किया है, कि भक्तिका मार्ग सुखकारक और सुलभ है। अब उसके । समत्वरूपी दूसरे बड़े और विशेष गुणका वर्णन करते हैं :-] (२९) मैं सब भूतोंको एक-सा हूँ। न मुझे (कोई) द्वेष्य अर्थात् अप्रिय है, और न (कोई) प्यारा। भक्तिसे जो मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं, और मैंभी उनमें हूँ। (३०) बड़ा दुराचारीही क्यों न हो, यदि वह मुझे अनन्यभावसे भजता है,