श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥ तो उसे साधुही समझना चाहिये। क्योकि उसकी बुद्धिका निश्चय अच्छी तरह हुआ है। (३१) वह जल्दी धर्मात्मा हो जाता है और नित्य शांति पाता है। हे कौंतेय ! तू भली भाँति समझे रह, कि मेरा भक्त (कभीभी) नष्ट नहीं होता । | [ तीसवें श्लोकका भावार्थ ऐसा न समझना चाहिये, कि भगवद्भक्त | यदि दुराचारी हो, तोभी व भगवान्को प्यारेही रहते हैं। भगवान् इतनाही कहते | हैं, कि पहले कोई मनुष्य दुराचारीभी रहा हो, परंतु जब एक बार उसकी बुद्धि | निश्चयमे परमेश्वराभिमुखका भजन करनेमे हो जाती है, तब आगे उसके हाथसे | कोईभी दुष्कर्म नहीं हो सकता; और फिर वह धीरे धीरे धर्मात्मा हो कर सिद्धि | पाता है, तथा अन्तमें इस सिद्धिस उसके पापका बिलकुल नाश हो जाता है। | सारांश, छठे अध्यायमें (६.४४) जो यह सिद्धान्त किया हे, कि कर्मयोगके | जाननेकी सिर्फ़ इच्छा होनेसेही कोल्हूमें अवश होकर मनुष्य शब्द-ब्रह्मसे परे | चला जाता है, अब उसीही भक्ति-मार्गके लिये लागू कर दिखलाया है। अब इस | बातकोही अधिक स्पष्ट करते हैं, कि परमेश्वर सब भूतोंको एक-सा कैसे है:- ] (३२) क्योंकि, हे पार्थ ! मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र, (अथवा) अन्त्यज आदि जो पापयोनि हों, वेभी परम गति पाते हैं। (३३) फिर पुण्यवान् ब्राह्मणोंकी, मेरे भक्तोंकी, और राजर्षियों, (क्षत्रियौं) की बात क्या कहनी है ? तू इस अनित्य और असुख अर्थात् दुःखकारक मृत्युलोकमें है, इस कारण मेरा भजन कर। | [ ३२ वे श्लोकके 'पापयोनि' शब्दको स्वतंत्र न मानकर कुछ टीकाकार | कहते हैं, कि वह स्त्रियो, वैश्यों और शूद्रोंकोभी लागू है, क्योंकि पहले कुछ-न- | कुछ पाप किये बिना कोईभी स्त्री, वैश्य या शूद्रका जन्म नही पाता। उनके मतमें | पापयोनि शब्द साधारण है और ये स्त्री, वैश्य तथा शूद्र उसके भेद उदाहरणार्थ | दिये गये हैं। परंतु हमारी रायमें यह अर्थ ठीक नहीं है। आजकल राजदरबारमें | जिन्हें 'गुन्हेगार जाति' कहते हैं, पापयोनि शब्दसे उस प्रकारका अर्थ विवक्षित | है। इस लोकका सिद्धान्त यह है, कि उस जातिके लोगोंकोभी भगवद्भक्तिसे