श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 810, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय ७६५ § § मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ ———————— | सिद्धि मिलती है। स्त्री, वैश्य और शूद्र इस वर्गके नहीं है, उन्हें मोक्ष मिलनेमें | इतनीही बाधा है, कि वे वेद सुननेके अधिकारी नहीं हैं। इसीसे भागवत-पुराणमें | कहा है, कि :- स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ | "स्त्रियों, शूद्रों अथवा कलियुगके नामधारी ब्राह्मणोंके कानोंमें वेद नहीं पहुँचते, | इस कारण उन्हें मूर्खतामे बचनेके लिये व्यासमुनिने कृपालु होकर उनके | कल्याणार्थही महाभारतकी - अर्थात् गीताकीभी - रचना की" ( भाग. १. ४. | २५ ) । भगवद्गीताके उक्त श्लोक कुछ पाठभेदसे अनुगीतामेंभी पाये जाते हैं | (मभा. अश्व. १९. ६१, ६२ ) । जातिका, वर्णका, स्त्री-पुरुष आदिका अथवा | काले-गोरे रंग प्रभृतिका कोईभी भेद न रखकर सबको एकही सद्गति देनेवाले | भगवद्भक्तिके इस राजमार्गका ठीक ठीक बड़प्पन इस देशकी - और विशेषतः | महाराष्ट्रकी - संतमंडलीके इतिहाससे किसीकोभी ज्ञात हो सकेगा । उल्लिखित | श्लोकका अधिक स्पष्टीकरण गीतारहस्यके प्र १३. पृ. ४३८-४४२ में किया है । | इस प्रकारके धर्मका आचरण करनेके विषयमें ३३ वें श्लोकके उत्तरार्धमें अर्जुनको | जो उपदेश किया गया है, अगले श्लोकमेंभी वही प्रचलित है । ] (३४) मुझमें मन लगाकर, मेरा भक्त हो, मेरा यजन-पूजन कर और मुझे नमस्कार कर, इस प्रकार मत्परायण होकर, योगका अभ्यास करनेसे मुझेही पावेगा। | [ वास्तवमें इस उपदेशका आरंभ ३३ वें श्लोकमेंही हो गया है । ३३ वें | श्लोकमे 'अनित्य' पद अध्यात्मशास्त्रके इस सिद्धान्तके अनुसार आया है, कि | प्रकृतिका फैलाव अथवा नामरूपात्मक दृश्य-सृष्टि अनित्य है और एक पर- | मन्माही नित्य है; और 'असुख' पदसे इस सिद्धान्तका अनुवाद किया गया है, | कि इस संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःख अधिक है । तथापि यह वर्णन अध्यात्मक | नहीं है, भक्ति-मार्गका है। अतएव भगवानने परब्रह्म अथवा परमात्मा शब्दका | प्रयोग न करके "मुझे भज, मुझमें मन लगा, मुझे नमस्कार कर", ऐसे व्यक्त- | स्वरूपके दर्शानेवाले प्रथम पुरुषका निर्देश किया है । भगवानका अंतिम कथन है,