श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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७६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र | कि हे अर्जुन ! इस प्रकार भक्ति करके मत्परायण होता हुआ योग अर्थात् कर्म- | योगका अभ्यास करता रहेगा, (गीता ७. १ ) तो तू कर्मबंधनसे मुक्त हो करके | निःसंदेह मुझे पा लेगा । इसी उपदेशकी पुनरावृत्ति ग्यारहवें अध्यायके अंतमें की | गई है। समस्त गीताका रहस्यभी यही है। भेद इतनाही है, कि इस रहस्यको | एक बार अध्यात्म-दृष्टिसे और एक बार भक्ति-दृष्टिसे बतला दिया है। ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए – अर्थात् कहे हुए – उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग – अर्थात् कर्मयोग -- शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, राजविद्या-राजगुह्ययोग नामक नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।