श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय ७६७ दशमोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥ यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ § § बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ दसवाँ अध्याय [ पिछले अध्यायमें कर्मयोगकी सिद्धिके लिये परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपकी उपासनाका जो राजमार्ग बतलाया गया है, उसीका वर्णन इस अध्यायमें हो रहा है, और अर्जुनके पूछनेपर, अंतमें परमेश्वरके अनेक व्यक्त रूपों अथवा विभूति- योंका, अंतमें वर्णन किया गया है । इस वर्णनको सुनकर अर्जुनके मनमें भगवानके प्रत्यक्ष स्वरूपको देखनेकी इच्छा हुई, अतः ११ वें अध्यायमें भगवानने उसे विश्वरूप दिखलाकर कृतार्थ किया है । ] श्रीभगवानने कहा :- ( १) हे महाबाहु ! ( मेरे भाषणसे ) संतुष्ट होनेवाले तुझसे, अब तेरे हितार्थ मैं फिर ( एक ) अच्छी बात कहता हूँ, उसे सुन । ( २ ) देवताओंके गण और महर्षिभी मेरी उत्पत्तिको नहीं जानते; क्योंकि देवताओं और महर्षिओका सब प्रकारसे मैंही आदिकरण ( हूँ ) । ( ३) जो जानता है, कि मैं ( पृथ्वी आदि सब ) लोगोंका बड़ा ईश्वर हूँ और मेरे जन्म तथा आदि नहीं हैं, मनुष्योंमें वही मोहविरहित हो कर सब पापोंसे मुक्त होता है । | [ ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें यह विचार पाया जाता है, कि भगवान् या | परब्रह्म देवताओंकेभी पहलेका है, देवता पीछेसे हुए ( गीतार. प्र. ९, पृ. २५६ ) । | इस प्रकार प्रस्तावना हो गई । अब भगवान् इसका निरूपण करते हैं, कि मैं | सबका महेश्वर कैसे हूँ :- ] (४) बुद्धि, ज्ञान, असंमोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव (उत्पत्ति), अभाव ( नाश ), भय, अभय,