श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥ (५) अहिंसा, समता, तुष्टि ( संतोष ), तप, दान, यश, अयशके आदि अनेक प्रकारके प्राणिमात्रके भाव मुझसेही उत्पन्न होते हैं। । [ 'भाव' शब्दका अर्थ है 'अवस्था', 'स्थिति' या 'वृत्ति' और सांख्य- । शास्त्रमें उनका 'बुद्धिके भाव' एवं 'शारीरिक भाव' ऐसा भेद किया गया है। । सांख्यशास्त्री पुरुषको अकर्ता और बुद्धिको प्रकृतिका एक विकार मानते हैं, इस- । लिये वे कहते हैं, कि लिंग-शरीरको पशु-पक्षी आदिके भिन्न भिन्न जन्म मिलनेका । कारण लिंग-शरीरमें रहनेवाली बुद्धिकी विभिन्न अवस्थाएँ अथवा भावही हैं । (गीतार. प्र. ८, पृ. १८९; सां. का. ४०-५५); और ऊपरके दो श्लोकोंमें उन्हीं । भावोंका वर्णन है। परंतु वेदान्तियोंका सिद्धान्त है, कि प्रकृति और पुरुषसेभी । परे परमात्मारूपी एक नित्य तत्त्व है और नासदीय सूक्तके वर्णनानुसार उसीके । मनमें सृष्टि निर्माण करनेकी इच्छा उत्पन्न होकर आगेपर सारा दृश्य जगत् । उत्पन्न होता है, इस कारण वेदान्तशास्त्रमेंभी कहा है, कि सृष्टिके मायात्मक सभी । पदार्थ परब्रह्मके मानस भाव हैं (अगला श्लोक देखो), तप, दान और यज्ञ आदि । शब्दोंसे तन्निष्ठ बुद्धिके भावही उद्दिष्ट हैं। भगवान् और कहते हैं, कि :-] (६) सात महर्षि, पहलेके चार, और मनु, ये मेरेही मानस अर्थात् मनसे निर्माण किये हुए भाव हैं, कि जिनसे ( इस ) लोकमें यह प्रजा हुई है। । [ यद्यपि इस श्लोकके शब्द सरल हैं, तथापि जिन पौराणिक पुरुषोंको । उद्देश्य करके यह श्लोक कहा गया है, उनके संबंधमें टीकाकारोंमें बहुतही मतभेद । है। विशेषतः अनेकोंने इसका निर्णय कई प्रकारसे किया है, कि 'पहलेके' (पूर्व) । और 'चार' ( चत्वारः ) पदोंका अन्वय किन पदोंसे लगाना चाहिये। सात । महर्षि प्रसिद्ध हैं, परंतु ब्रह्माके एक कल्पमें चौदह मन्वन्तर ( गीतार. प्र. ८, पृ. । १९४ ) होते हैं और प्रत्येक मन्वंतरके मनु, देवता एवं सप्तर्षि भिन्न भिन्न होते । हैं ( हरिवंश १, ७; विष्णु. ३. १; मत्स्य. ९ )। इसीसे 'पहलेके' शब्दको सात । महर्षियोंका विशेषण मान कई लोगोंने ऐसा अर्थ किया है, कि आजकलके, अर्थात् । वैवस्वत मन्वंतरसे पहलेके, चाक्षुष मन्वंतरवाले सप्तर्षि यहाँ विवक्षित हैं। भृगु । आदि इन सप्तर्षियोंके नाम हैं - भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा । और सहिष्णु । किंतु हमारे मतमे यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योंकि, आजकलके । अर्थात् वैवस्वत अथवा जिस मन्वन्तरमें गीता कही गई, उससे, पहलेके मन्वंतर-