श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय ७६९
| वाले सप्तर्षि यहाँ बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं है, अतः वर्तमान मन्वंतर- | केही सप्तर्षि लेने चाहिये । महाभारतके शांतिपर्वके नारायणीयोपाख्यानमें इनके | ये नाम हैं – मरीचि, अंगिरस, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ (मभा. | शां. ३३५. २८, २९; ३४०. ६४, ६५); और हमारे मतसे येही यहाँपर | विवक्षित हैं। क्योंकि गीतामें नारायणीय अथवा भागवत धर्मही विधिसहित | प्रतिपाद्य है (गीतार. पृ. ८–९)। तथापि यहाँ इतना बतला देना आवश्यक | है, कि मरीचि आदि सप्तर्षियोंके उक्त नाम कहीं कहीं अंगिरसके बदले भृगुसे | दिये हुए पाये जाते हैं; और कुछ स्थानोंपर तो ऐसा वर्णन है, कि कश्यप, अत्रि, | भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ वर्तमान युगके सप्तर्षि | हैं (विष्णु. ३. १. ३२, ३३; मत्स्य ९. २७, २८; मभा. अनु. ९३. २१)। | मरीचि आदि ऊपर लिखे हुए सात ऋषियोंमेंही भृगु और दक्षको मिलाकर | विष्णु-पुराणमें (विष्णु. १. ७. ५, ६) नौ मानसपुत्रोंका और इन्हींमें फिर | नारदकोभी जोड़ कर मनुस्मृतिमें ब्रह्मदेवके दस मानसपुत्रोंका वर्णन है (मनु. | १. ३४, ३५); और इन मरीचि आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति भारतमें की गई है | (म.भा. अनु. ८५)। परंतु हमें अभी इतनाही देखना है, कि सात महर्षि कौन | कौन हैं, इस कारण इन नौ-दस मानसपुत्रोंका अथवा इनके नामोंकी व्युत्पत्तिका | यहाँ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रकट है कि, 'पहलेके' इस पदका | अर्थ 'पूर्व मन्वन्तरके सात महर्षि' लेंगा नहीं सकते। अब देखना है, कि 'पहलेके | चार' इन शब्दोंको मनुका विशेषण मानकर कई एकोंने जो अर्थ किया है, वह | कहाँ तक युक्तिसंगत है? कुल चौदह मन्वंतर हैं और इनके चौदह मनु हैं; | उनमें सात-सातके दो वर्ग हैं। पहले सातोंके नाम स्वायंभुव, स्वारोचिष, औत्तमी, | तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत हैं, तथा ये स्वायंभुव आदि मनु कहे जाते | हैं (मनु. १. ६२, ६३)। इनमेंसे छः मनु हो चुके और आजकल सातवाँ अर्थात् | वैवस्वत मनु चल रहा है। इसके समाप्त होनेपर आगे सात मनु आवेंगे (भाग. | ८. १३. ७), उनको सावर्णि मनु कहते हैं; उनके नाम हैं – सावर्णि, दक्षसावर्णि, | ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इंद्रसावर्णि (विष्णु. ३. २; | भाग. ८. १३; हरिवंश १. ७)। इस प्रकार प्रत्येक मनुके सात सात होनेपर | इस बातका कोई कारण नहीं बतलाया जा सकता, कि किसीभी वर्गके 'पहलेके' | अर्थात् पहले 'चार' ही गीतामें क्यों विवक्षित हों ? ब्रह्मांड-पुराणमें (४. १) | कथा है, कि सावर्णि मनुओंमेंसे पहले मनुको छोड़कर अगले चार अर्थात्-दक्ष-, | ब्रह्म-, धर्म- और रुद्रसावर्णि एकही समयमें उत्पन्न हुए; और इसी आधारसे | कुछ लोग कहते हैं, कि; ये चार सावर्णि मनुही गीतामें विवक्षित हैं। किंतु इस- | पर दूसरा आक्षेप यह है, कि ये सब सावर्णि मनु भविष्यमें होनेवाले हैं, इस कारण | “जिनसे इस लोकमें यह प्रजा हुई” यह भूतकालदर्शक अगला वाक्य भावी गी. र. ४९