भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 956 में से

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पृष्ठ 815

७७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । सावर्णि मनुओंको लागू नहीं हो सकता। इसी प्रकार 'पहलेके चार' शब्दोंका । संबंध 'मनु' पदसे जोड़ देना ठीक नहीं है। अतएव कहना पड़ता है, कि 'पहलेके । चार' ये दोनों शब्द स्वतंत्र रीतिसे प्राचीन कालके किन्हीं चार ऋषियों अथवा । पुरुषोंका बोध कराते हैं। और ऐसा मान लेनेसे यह प्रश्न सहजही होता है, कि । ये पहलेके चार ऋषि या पुरुष कौन हैं ? जिन टीकाकारोंने इस श्लोकका ऐसा । अर्थ किया है, उनके मतमें सनक, सनंद, सनातन और सनत्कुमार (भाग. ३. । १२. ४) येही वे चार ऋषि हैं। किंतु इस अर्थपर आक्षेप यह है, कि यद्यपि ये । चारों ऋषि ब्रह्माके मानसपुत्र हैं, तथापि ये सभी जन्मसेही संन्यासी होनेके । कारण प्रजावृद्धि नहीं करते थे, इससे ब्रह्मा इनपर क्रुद्ध हो गये थे (भाग. ३. । १२; विष्णु. १. ७)। अर्थात् जिनसे इस लोकमें यह प्रजा हुई" - "येषां लोक । इमाः प्रजाः" यह वाक्य इन चार ऋषियोंको बिलकुलही उपयुक्त नहीं होता। । इसके अतिरिक्त पुराणोंमें यद्यपि यह वर्णन है, कि ये ऋषि चार थे; तथापि । भारतके नारायणीय अर्थात् भागवत धर्ममें कहा है, कि इन चारोंमें सन, कपिल । और सनत्सुजातको मिला लेनेसे जो सात ऋषि होते हैं, वे सातों ब्रह्माके मानस- । पुत्र हैं और पहलेसेही वे निवृत्ति-धर्मके थे (मभा. शां. ३४०. ६७; ६८)। इस । प्रकार सनक आदि ऋषियोंको सात मान लेनेसे कोई कारण नहीं दीख पड़ता, । कि उनमेंसे चारही यहाँ क्यों लिये जायें। फिर 'पहलेके चार' हैं कौन ? हमारे । मतमें इस प्रश्नका उत्तर नारायणीय अथवां भागवत धर्मकी पौराणिक कथाओंसेही । दिया जाना चाहिये। क्योंकि यह निर्विवाद है, कि गीतामें भागवत धर्महीका । प्रतिपादन किया गया है। अब यदि यह देखें, कि भागवत धर्ममें सृष्टिकी उत्पत्तिकी । कल्पना किस प्रकारकी थी, तो पता लगेगा, कि मरीचि आदि सात ऋषियोंके । पहले वासुदेव (आत्मा), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन), और अनिरुद्ध । (अहंकार) ये चार मूर्तियाँ उत्पन्न हो गई थीं, और कहा है, कि आगे इनमेंसे । पिछले अनिरुद्धसे अर्थात् ब्रह्मदेवसे मरीचि आदि पुत्र उत्पन्न हुए (मभा. शां. । ३३९. ३४-४०, ६०-७२; ३४०. २७-३१)। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और । अनिरुद्ध इन्हीं चार मूर्तियोंको 'चतुर्व्यूह' कहते हैं और भागवत धर्मके एक । पंथका मत है, कि ये चारों मूर्तियाँ स्वतंत्र थीं; तथा दूसरे कुछ लोग इनमेंसे तीन । अथवा दोकोही प्रधान मानते हैं। किंतु भगवद्गीताको ये कल्पनाएँ मान्य नहीं । हैं; और हमने गीतारहस्य प्र. ८, पृ. १९६ और परि. ५३९-५४० में दिखलाया । हैं, कि गीता एकव्यूह-पंथकी है, अर्थात् एकही परमेश्वरसे चतुर्व्यूह आदि सब । कुछकी उत्पत्ति मानती है। अतः व्यूहात्मक वासुदेव आदि मूर्तियोंको स्वतंत्र न । मानकर इस श्लोकमें दर्शाया है, कि ये चारों व्यूह एकही परमेश्वर अर्थात् । सर्वव्यापी वासुदेवके (गीता ७. १९) 'भाव' हैं। इस दृष्टिसे देखनेपर विदित । होगा, कि भागवत धर्मके अनुसार 'पहलेके चार' इन शब्दोंका उपयोग वासुदेव

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