श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय ७७१ §§ एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥ | आदि चतुर्व्यूहके लिये किया गया है, कि जो सप्तर्षियोंके पूर्व उत्पन्न हुए थे । | भारतमेंही लिखा है, कि भागवत धर्मके चतुर्व्यूह आदि भेद पहलेमेही प्रचलित | थे (मभा. शां. ३४८. ५७) । यह कल्पना कुछ हमारीही नई नहीं है । सारांश, | भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यानके अनुसार हमने इस श्लोकका अर्थ यों लगाया | है – 'सात महर्षि' अर्थात् मरीचि आदि; 'पहलेके चार' अर्थात् वासुदेव आदि | चतुर्व्यूह; और 'मनु' अर्थात् जो उस समयसे पहले हो चुके थे और वर्तमान, सब | मिला कर स्वायंभुव आदि सात मनु । अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार आदि चार | मूर्तियोंको परमेश्वरके पुत्र माननेकी कल्पना भारतके अन्य स्थानोंमेंभी पाई | जाती है ( मभा. शां. ३११. ७, ८ ) । परमेश्वरके भावोंका वर्णन हो चुका; अब | बतलाते हैं, कि इन्हें जानकर उपासना करनेसे क्या फल मिलता है :- ] (७) जो मेरी इस विभूति अर्थात् विस्तारके, और योग अर्थात् इस विस्तार करनेकी युक्ति या सामर्थ्यके तत्त्वको जानता है, उसे निस्संदेह स्थिर (कर्म-)योग प्राप्त होता है। (८) यह जानकर, कि मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ, और मुझसे सब वस्तुओंकी प्रवृत्ति होती है, ज्ञानी पुरुष भावयुक्त होते हुए मुझको भजते रहते हैं। (९) (वे) मुझमें मन जमाकर और प्राणोंको लगाकर, परस्पर बोध करते हुए एवं मेरी कथाएँ कहते हुए, ( उसीमें ) सदा संतुष्ट और रममाण रहते हैं। (१०) इस प्रकार सदैव युक्त होकर अर्थात् समाधानसे रह कर जो लोग मुझे प्रीतिपूर्वक भजते हैं, उनको मैंही ऐसी (समत्व-)बुद्धिका योग देता हूँ, कि जिससे वे मुझे पा लेंगे। (११) और उनपर अनुग्रह करनेके लियेही मैं उनके आत्मभाव अर्थात् अंतःकरणमें पैठकर तेजस्वी ज्ञानदीपसे ( उनके मनके ) अज्ञानमूलक अंधकारका नाश करता हूँ।