श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय ७७३ कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥ विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ श्रीभगवानुवाच । §§ हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥ जिन विभूतियोंसे इन सब लोकोंको तुम व्याप्तकर रहे हो, उन्हें आप-ही (कृपा कर) मुझे पूर्णतासे बतलावें । (१७) हे योगिन् ! (मुझे यह बतलाइये, कि) सदा तुम्हारा चिंतन करता हुआ मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ; और हे भगवन् ! मैं किन किन पदार्थोंमें तुम्हारा चिंतन करूँ ? (१८) हे जनार्दन ! अपनी विभूति और योग मुझे फिर विस्तारसे बतलाओ, क्योंकि अमृततुल्य (तुम्हारे इस भाषणको) सुनते सुनते मेरी तृप्ति नहीं होती । | [ विभूति ओर योग, ये दोनों शब्द इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें आये | हैं। और यहाँ अर्जुनने उन्हींको दोहरा दिया है। 'योग' शब्दका अर्थ पहले | (गीता ७. २५) दिया जा चुका है, उसे देखो। भगवान्की विभूतियोंको अर्जुन | इसलिये नहीं पूछता, कि भिन्न भिन्न विभूतियोंका ध्यान देवता समझ कर किया | जावे; किंतु सत्रहवें श्लोकके इस कथनको स्मरण रखना चाहिये, कि उक्त | विभूतियोंमें सर्वव्यापी परमेश्वरकीही भावना रखनेके लिये पूछता है। क्योंकि | भगवान् यह पहलेही बतला चुके हैं (गीता ७. २०-२५; ९. २२-२८), कि | एकही परमेश्वरको सब स्थानोंमें विद्यमान जानना एक बात है, और परमेश्वरकी | भिन्न-भिन्न विभूतियोंको भिन्न-भिन्न देवता मानना दूसरी बात है; इन दोनोंमें | भक्ति-मार्गकी दृष्टिसे महान् अंतर है।] श्रीभगवानने कहा :- (१९) अच्छा; तो अब हे कुरुश्रेष्ठ ! अपनी दिव्य विभूतियोंमेंसे तुम्हें मुख्य मुख्य बतलाता हूँ; क्योकि मेरे विस्तारका अंत नहीं है। | [ इस विभूति-वर्णनके समानही महाभारतके अनुशासनपर्वमें (अनु. १४. | ३११-३३१) और अनुगीतामें (अश्व. ४३, ४४) परमेश्वरके रूपका वर्णन | है। परंतु गीताका वर्णन उसकी अपेक्षा अधिक सरस है, इस कारण उसीकी | पुनरुक्ति और स्थलोंमेंभी मिलती है। उदाहरणार्थ, भागवत-पुराणके एकादश | स्कंधके सोलहवें अध्यायमें इसी प्रकारका विभूति-वर्णन भगवानने उद्धवको