श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 752, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय ७०७ षष्ठोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥ छठा अध्याय [ इतना तो सिद्ध हो गया, कि मोक्षप्राप्ति होनेके लिये ज्ञानके सिवा और किसीकीभी अपेक्षा न हो, तोभी लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ज्ञानी पुरुषको ज्ञानके अनंतरभी कर्म करते रहना चाहिये, परंतु फलाशा छोड़कर उन्हें सम-बुद्धिमे इसलिये करे, ताकि वे बंधक न हो जावें, इसेही कर्मयोग कहते हैं, और कर्म-संन्यास-मार्गकी अपेक्षा यह अधिक श्रेयस्कर है। तथापि इतनेमेही कर्मयोगका प्रतिपादन समाप्त नही होता । तीसरेही अध्यायमें काम-क्रोध आदिका वर्णन करते हुए भगवानने अर्जुनसे कहा है, कि ये शत्रु मनुष्यकी इंद्रियोंमें, मनमें और बुद्धिमें घर करके उसके ज्ञान-विज्ञानका नाशकर देते हैं ( गीता. ३. ४० ), अतः तू इंद्रियोंके निग्रहसे इनको पहले जीत ले । इस उपदेशको पूर्ण करनेके लिये इन दो प्रश्नोंका स्पष्टीकरण करना आवश्यक था, कि ( १ ) इंद्रियनिग्रह कैसे करें और ( २ ) ज्ञान-विज्ञान किसे कहते हैं ? परंतु बीचमेंही अर्जुनके प्रश्नोंसे यह बतलाना पड़ा कि कर्म-संन्यास और कर्मयोग इन दोनोंमें अधिक अच्छा मार्ग कौन-सा है, और फिर इन दोनों मार्गोंकी यथाशक्य एकवाक्यताभी करके यह प्रतिपादन किया गया है, कि कर्मोंको न छोड़करभी, उन्हीको निःसंग- बुद्धिसे करते जानेपर ब्रह्म-निर्वाणरूपी मोक्ष क्योंकर मिलता है ? अब इस अध्यायमें उन साधनोंके निरूपण करनेका आरंभ किया गया है, जिनकी आवश्यकता कर्मयोगमेंभी उक्त निःसंग या ब्रह्मनिष्ठ स्थिति प्राप्त करनेमें होती है। तथापि यह निरूपणभी स्वतंत्र रीतिसे पातंजलयोगका उपदेश करनेके लिये नहीं किया गया है, और यह बात पाठकोंके ध्यानमें आ जाय, इसलिये यहाँ पिछले अध्यायोंमे प्रतिपादन की हुई बातोंकाही प्रथम उल्लेख किया गया है, जैसे - फलाशा छोड़कर कर्म करनेवाले पुरुषकोही सच्चा संन्यासी समझना चाहिये, कर्म छोड़नेवालेको नहीं, ( गीता ५. ३ ) इत्यादि । ] श्रीभगवानने कहा :- ( १ ) कर्मफलका आश्रय न करके ( अर्थात् मनमें फलाशाको न टिकने देकर ) जो ( शास्त्रानुसार अपने विहित ) कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और वही कर्मयोगी है। निरग्नि अर्थात् अग्निहोत्र आदि कर्मोंको छोड़ देनेवाला अथवा अक्रिय अर्थात् कोईभी कर्म न करके निठल्ले बैठनेवाला