श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
पृष्ठ 751, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 751
७०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे संन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ (२९) जो मुझको (सब) यज्ञों और तपोंका भोक्ता, (स्वर्ग आदि) सब लोकोंका बड़ा स्वामी, एवं सब प्राणियोंका मित्र जानता है, वही शांति पाता है। इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषद्में, ब्रह्म विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें संन्यासयोग नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।