भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 750

पाँचवाँ अध्याय ७०५ लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥ जिन ऋषियोंकी द्वंद्वबुद्धि छूट गई है, अर्थात् जिन्होंने इस तत्त्वको जान लिया है, कि सब स्थानोंमें एकही परमेश्वर है, जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, और जो आत्मसंयमसे सब प्राणियोंका हित करनेमें रत हो गये हैं, उन्हें यह ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिलता है। (२५) कामक्रोधविरहित, आत्मसंयमी और आत्मज्ञानसंपन्न यतियोंको 'अभितः' अर्थात् आसपास या सन्मुख रखा हुआ-सा (अर्थात् बैठे-बिठाये) ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिल जाता है। (२७) बाह्य पदार्थोंके (इंद्रियोंके सुख- दुःखदायक) संयोगसे अलग होकर, दोनों भौहोंके बीचमें दृष्टिको जमाकर और नाकसे चलनेवाले प्राण एवं अपानको सम करके, (२८) जिसने इंद्रियों, मन और बुद्धिका संयम कर लिया है, तथा जिसके भय, इच्छा और क्रोध छूट गये हैं, वह मोक्षपरायण मुनि सदा-सर्वदा मुक्तही है। । [ गीतारहस्यके नवम (पृ. २३४, २४८) और दशम (पृ. ३००) । प्रकरणोंसे ज्ञात होगा, कि यह वर्णन जीवन्मुक्तावस्थाका है। परंतु हमारी रायमें । टीकाकारोंका यह कथन ठीक नहीं, कि यह वर्णन संन्यास-मार्गके पुरुषका है। । संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्गोंमें शांति तो एक-ही-सी रहती है, और उतनेहीके । लिये यह वर्णन संन्यासमार्गको उपयुक्त हो सकेगा। परंतु इस अध्यायके । आरंभमें कर्मयोगको श्रेष्ठ निश्चित कर फिर २५ वें श्लोकमें जो यह कहा है, कि । ज्ञानी पुरुष सब प्राणियोंका हित करनेमें प्रत्यक्ष मग्न रहते हैं, उससे प्रकट । होता है, कि यह समस्त वर्णन कर्मयोगी जीवन्मुक्तकाही है, संन्यासीका नहीं है । (गीतार. प्र. १२, पृ. ३५८ देखो)। कर्ममार्गमेंभी सर्वभूतान्तर्गत परमेश्वरको । पहचाननाही परमसाध्य है, अतः भगवान् अंतमें कहते हैं, कि :- ] गी. र. ४५