सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
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२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्य / पाद | संदर्भ / पृष्ठ | पद्य / पाद | संदर्भ / पृष्ठ | पद्य / पाद | संदर्भ / पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अचकमत् सप(किरात.१० ४९) | २८८।३८ | अणुरपि मणि प्राण(सु ३२५) | ५१।२२७ | अत्यच्छ सितमंशु | ३३६।२८ |
| अचतुर्वदनो ब्रह्मा (कुव ५) | ३६।५६ | अणुरप्यसता सङ्ग | ८७।४ | अत्यच्छेनातिरु | २४६।२० |
| अचलं चलदिव | २५५।१३ | अत एव निपीयते | ३४९।६१ | अत्यद्भुतमिदं (सु ५१४) | ७०।२१ |
| अचला कमला | १६५।५६३ | अत कविनां (भाग २ २) | ३८९।४९१ | अत्यन्तचञ्च (कथा.३७.२३२) | ३७९।८९ |
| अचिन्तितानि (शा प स ७) | ७५।५ | अतनुज्वरपीडि | १८९।६० | अत्यन्तमन्थन | १७६।९५५ |
| अचिन्तितानि (हि १ १५७) | ९१।१७ | अतन्द्रचन्द्राभरणा (का प्र ४ ७२) | २५३।५ | अत्यन्तविमुखे दैवे (हि १.१२४) | ६५।९ |
| अचिन्त्या (शा प २२२) | ५२।२४१ | अतसीकुसुमोपमेय | २२१।२३ | अत्यम्बुपाना (विक्रम.२३७) | ३७९।८७ |
| अचिराधिष्ठित | १५१।३६६ | अतसीपुष्पसकाशं | १८१।१९ | अत्यपूर्वेस्य | २६९।४०६ |
| अचिरेण परस्य | १५१।३८७ | अताडयत्पल्लव | ३३४।१०५ | अत्यर्थवकत्वमन (सु १७४) | ४०।४२ |
| अचोद्यमानानि (ना.१२ ६७५६) | ९१।१३ | अतिकुपिता अपि (शा प स ९) | ४७।१११ | अत्यादरपरो (प्रब ८८) | ३७९।८६ |
| अच्छप्रकाशवति | ३०४।१५४ | अतिक्रान्त का (भर्तृ ३ १०१) | ३६८।५३ | अत्यादरादध्ययनं | १०४।१०६ |
| अच्छिन्नं नयना (सु १४०७) | २८९।७० | अतिक्रेशेन (मा ५ १५२१) | ३७९।९६ | अत्यायत्तै (का प्र १० ३९४) | ११०।१४३ |
| अच्छिन्नामृतबिन्दु | २७४।२५ | अतिगम्भीरे भूपे | १५१।३७० | अत्यार्यमतिदातारम(मा ५.१५०९) | ६२।५ |
| अच्युतभक्तिवशा | १८९।४८ | अतितेज (शा प रा ११३) | १५१।३६५ | अत्यासन्ना (शा.प.रा.९४) | १५६।१२४ |
| अजनि प्रतिदिन | २८४।७ | अतिथिर्बालक | १५७।२०६ | अत्युक्तिं रह (पञ्च.१ २५) | ३८४।२८२ |
| अजन्मा पुरु(किरात ११ ७०) | १४९।३०८ | अतिदर्पे हता | १६९।३८३ | अत्युक्तौ यदि न (शा.प सा) | १३३।१३ |
| अजरामरव (शा प ६६९) | १६२।४२७ | अतिदाक्षिण्ययु | १६१।३५३ | अत्युच्चा परित (कुव १०२) | ११०।२३२ |
| अजस्रं लसत्पद्मि | २०९।६ | अतिदाना (शा प नी २६) | १५३।२० | अत्युच्छ्रिते (हि २ १२०) | १५१।३७८ |
| अजस्रमभ्यास | १०५।१३० | अतिदीर्घजीवितो | ३५।११ | अत्युस्तेकेन स (राग ४ ५१७) | ३७९।८४ |
| अजातमृतमूर्खा (हि प्र १३) | ९०।५ | अतिदूरपथ (वृ.ख नी १५) | १६०।२९८ | अत्युदात्तु (राग ३ ३०४) | ३७९।८३ |
| अजातमृतमूर्खेभ्यो (शा प १४८३) | ९०।६ | अतिपरिचया | १६९।७२४ | अत्युन्नतस्तन (सा द २.१६१) | २५५।२२ |
| अजाखरखरो (पञ्च.२ १०८) | ३७९।१०१ | अतिपरिचया(शा.प.नी ८३) | १६९।७२३ | अत्युन्नतिं प्राप्य (स.पा ५७) | ३७९।८१ |
| अजानन्दाहात्तै(भर्तृ.स.१६०) | ३७४।२१४ | अतिपरिचया | १६९।७२२ | अत्युल्लसद्धिसरहस्य | ३३५।२ |
| अजामिव प्रजा(शा प १२९०) | १४५।१२२ | अतिपूजिततारेयं | २५९।७४ | अत्युष्णात्सघृता | १६७।६२८ |
| अजायुद्धमृषि (शा प स ८) | १५३।२७ | अतिपेलवमति (का प्र.७ २०२) | ५७।१३४ | अत्र मन्मथम | १८३।१९० |
| अजीयतावर्त्त (नैषध ७ ६९) | २६४।२२९ | अतिप्रचण्डा | १७५।९२२ | अत्रस्थ. सखि | २२८।२२४ |
| अज्ञ सुखमाराध्य (हि १ ५६) | ४०।२५ | अतिबहुतरलज्जा | २६८।३६० | अत्रान्तरे च (गीत ७ १३ १) | ३०४।१५३ |
| अज्ञतया प्रेम्णा | २१८।७३ | अतिमन्दचन्दन | ३३४।१२६ | अत्राशितं शयित | २७४।२ |
| अज्ञातपाण्डित्यर (सु १६९) | ४०।३४ | अतिमलिने कर्ते (शा.प.नी.८३) | ५७।१२६ | अत्रिलोचनस (का प्र ७ १५८) | १८८।४१ |
| अज्ञातशास्त्रसद्भावा | ४४।५ | अतिमात्रभाखरस्त्व | ८६।८ | अथ कोकिल | २२५।१२९ |
| अज्ञातेन्दुपराभवं | २६३।२०५ | अतिरमणीये काव्ये | ३७।१४ | अथ नभसि निरी | ३४१।५२ |
| अज्ञानाद्यदि (म.११.२३२) | ३७९।९९ | अतिवादास्ति (म.६.४७) | ३७९।९५ | अथ नित्यम (भाग ७ २ ४९) | ३७९।८० |
| अज्ञेभ्यो ग्रन्थि (म १२ १०३) | ३७९।९८ | अतिविततगगनस(का प्र ७ २५५) | २७।३ | अथ पथिकवधूद | २९९।१० |
| अज्ञानामविरामलौ | ९९।२० | अतिविपुलं कुच (अरसीठकुर.) | १४।५ | अथ प्रसन्नेन्दु (सु १८१८) | ३४४।१३ |
| अज्ञानेन पराङ्मुखी (अमरू.२४) | ३१०।१२ | अतिव्ययोऽनवे (हि २ ९०) | १४६।१४३ | अथ बद्धजटे रामे | ३६१।५ |
| अज्ञो वा यदि | १५२।४१६ | अतिशयितकद | ३४१।१३ | अथ मन्मथवा (शा प ३६२२) | २९९।१७ |
| अञ्चति रजनिरूह | ३०८।७ | अतिसञ्चयकर्तॄणा (सु ४७४) | ७१।२८ | अथ लक्ष्मणामु (शिशु ९ ३१) | ३००।५६ |
| अञ्जनस्य क्षय दृष्ट्वा (हि २ ९) | १५४।४३ | अतिसत्कृता अपि (सु ४०४) | ५८।१७९ | अथ वाभिनिविष्ट (शिशु.१६ ४३) | ४०।४६ |
| अञ्जलिकारि लोके | ९८।८ | अतिसाहसमतिदु (शा.प लो २) | ७२।३८ | अथ सान्द्रसाध्यकि (शिशु ९ ५२) | २९६।३ |
| अञ्जलिस्यानि पुष्पाणि (शा प प ३) | ४५।३ | अतीतानागता (भा १.०२४४) | ३७९।९३ | अथ स्फुरन्मीन (किरात ८ ३७) | ३३८।७२ |
| अञ्जलौ जलमवीर | ३३८।९८ | अतीव गुण (भा.५.१४.५५) | ३७९।९२ | अथ स्वस्थाय देवाय | ९।१ |
| अटत्कटकघोटकप्र | ११५।३५ | अतुष्टिदानं (हि १ ११८) | ३७९।९० | अथेदं रक्षोभि (उत्तर.१.२८) | ३६२।३२ |
| अटवी कीदृशी प्रायो | १९८।६ | अतुहिनरुचिना (शिशु ११ ४६) | ३२७।१५ | अयोञ्चकैर्जलठक (शिशु.१७ ५२) | १२७।१ |
| अट्ठशूला जनपदा | १८७।१५ | अतो हास्यतरं (म.१.३०८७) | ५६।१०१ | अयोपगूढे शरदा शशा (कुव ६१) | ३४४।३ |
| अत्तुं वाञ्छति (पञ्च.१ १७५) | ३६५।५२ | अद समित्समु (नैषध १२ ३५) | १३५।१५ |