सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
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सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २१
| कावेरीतीरभू (भर्तृ स ४५०) | २३५।१३६ | किं कोकिलस्य वि | १७६।९६६ | किं तेन हेमगिरिणा (भर्तृ २.७८) | २१५।७ |
| कावेरीवारिवे (सूक्ति ५९ ३३) | ३२७।३८ | किं कोमलै कल | २८०।१३४ | किं ते निसर्गदन्धि | ३०६।२९ |
| काव्यं करोषि किमु(सूक्ति ५ ४) | ३८।२२ | किं कौमुदी (शा प.३२६९) | २७३।१५ | किं त्राणं जगता | २०४।१९६ |
| काव्यप्रपञ्चचू रच | ३२।२० | किं कमिष्यति (शिशु १४ ७५) | ३६३।१४ | किं त्व न वेन्सि (शा.प.४४०) | ९१।३८ |
| काव्यमय्यो गिरो (शा प.१७१) | ३२।११ | किं क्रूरं फणिह | १७०।७५२ | किं त्वं निगूहसे (शा.प.३५१०) | २९३।३ |
| काव्यास्याक्षरमैत्रीभा | ३१।२४ | किं क्रूर स्त्री (वृ चा २.६६) | १७१।७२१ | किं त्वा भणामि विच्छे | ३०५।२ |
| काव्यास्याग्रफलस्यापि | ३०।८ | किं कापि प्रल (शा प ८२७) | २२४।१०१ | किं दूरेण पयो (शा प ८७२) | २२७।१७७ |
| काव्यामृतं दुर्जनराहु (सु १७२) | ४०।४० | किं खलु रत्नैरेतै किं | २१६।८ | किं देवकार्याणि(विक्रम ११९) | ३८६।३७३ |
| काव्ये भव्यतमेऽपि विज्ञ(पदस २) | ४१।७० | किं गजेन | ३८४।२७३ | किं दोर्भ्यां किमु (शा प.१२८) | २०।७० |
| का शंभुकान्ता किमु | १९७।१७ | किं गतेन यदि सा (सु.१७४८) | ३४४।८३ | किं धनेन कुबेर | १६०।३१५ |
| काशा धीरानि (शा प ३९०६) | ३४४।११ | किं गोत्रं किमु जीवन | ६।७९ | किं न द्रुमा (नैषध ११ १२५) | २२७।३३ |
| का शृङ्गारकथा (हनु ६ ४१) | १२०।१५१ | किं चन्दनै (शृङ्गारति २ २) | ३८४।२७४ | किं न पश्यति महे | २२३।६६ |
| का शैलपुत्री किमु | १९७।१९ | किं चन्द्रमाः प्रत्यु | ४९।१८६ | किं नर्भेदाया मम | २६५।२७२ |
| काश्मर्या कृतमाल | ३३७।४९ | किं चान्यै सुकुला (हि.२.९३) | ६६।१४ | किं नु ध्वान्त(सूक्ति ७२ २५) | २०३।१३५ |
| काश्मीरगौरव (शा.प ३६०९) | २९७।२३ | किं चारुचारित्रविला | ३३।३३ | किं नु मे स्या (भोज.२३) | १६१।३५७ |
| काश्मीरद्रवगौरि | ३१४।७७ | किंचित्कम्पितपा (शा प ३५३०) | ३०५।३ | किं पद्मस्य रुचिं न (कुव २०) | ३१४।७३ |
| काश्मीरेण दिहा | ३०४।१६४ | किंचित्कुञ्चितहारयष्टि | २७३।६ | किं पुष्पे किं (शा प १०४९) | २४२।१७४ |
| का श्लाघ्या गुणि | १७९।१०२१ | किंचित्कोपफला (हनु १४ ८७) | ३६५।६ | किं पृष्टेन द्रुत (शा.प.२४९३) | २८९।४९ |
| काष्ठानुषङ्गात्परिव | ११४।१७ | किं चित्रे भुवनानि | १३६।५० | किं पौरुषं रक्षति (भोज.१५३) | १७२।८३० |
| का सबुद्धि सुभ | २०३।१०१ | किं चित्रे यदि (सु १५३७) | १७९।१०२९ | किं बान्धवेन रवि | २४४।२३१ |
| कासारेषु सरित्सु (चा त ४) | १८४।७९ | किंचित्सविभ्रमोदधि | २५८।५५ | किं ब्रूमो हरिं (शा प.४०२५) | ३६३।२२ |
| कासि त्वं वद चौ | २३१।४७ | किंचिदाश्रयसंयोगाद्व | ८६।२ | किं भक्तेनास (हि २.७६) | १४५।१४० |
| किं कण्ठे शिथि (वेणी २ ९) | ३०७।५७ | किंचिद्विश्लथकेशवा | ३२५।६३ | किं भूमौ परि (शा.प ३६०६) | २९७।३१ |
| किं कंदर्प करं (शा प ४०९६) | ३६९।७४ | किंचिन्निर्मुच्यमाने गगन (सु.४५) | १६।४१ | किं भूषणं (सा द.१०.८२) | १७६।९४८ |
| किं कन्दा कन्दरे (भर्तृ ३ २६) | ९७।१४ | किंचिन्मुद्रित (अमरु.११८) | ३४२।६३ | किं भूषणं सुन्दर | १९७।२६ |
| किं करिष्यति (चा नी २.१०) | ३९४।६९३ | किं चैतद्गुरुसेवने कि | ३१७।६ | किं मधुना कि वि | ४८।१३५ |
| किं करिष्यन्ति (सु २७९०) | १६२।४२६ | किं छत्रं कि तु र (सूक्ति २ ८५) | २७।१५ | किं मध्याह्नेदिवाक | ११५।५० |
| किं करोति नरः प्रा (शा प.४५२) | ९०।६ | किं जन्मना च मह | ५०।२०२ | किं मालतीकुसु (शा.प.१००६) | २३९।८६ |
| किं करोति (विक्रम १२ २६४) | ९१।३१ | किञ्जल्कराजिरिव नील | १८।७ | किं मुग्धमासनम | ३०६।२६ |
| किं करोमि क गच्छा | ६६।१२ | किं जातैर्बहुभि पुत्रै (शुक.२२) | ९०।१० | किं मुञ्चन्ति पयो | १९९।२६ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (शा प १५९) | ३७।६ | किं जातोऽसि (भट्ट.३८) | २३६।१८ | किं मृष्ट सुतवचनं | ८९।९ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (सु.१३४) | ३७।५ | किं जीवितेन | ३८५।३१४ | किं मे सद्गुरुसेवनै. | २८०।९५ |
| किं कारणं सुकवि | १०५।१३८ | किं तया क्रियते (हनु १३ १५) | ९०।२ | किं युक्तं बत माम | २५।८८ |
| किं किं वक्त्रमुपेत्य | ३०९।८ | किं तया क्रि (शा प प २.१४१) | ६९।२२ | किं रुद्ध प्रि (शृङ्गारति.१.७५) | २८९।८४ |
| किं कि सिंहस्वतः किं | १९।५५ | किं तारुण्यत (सा.द १०.३६) | २७२।७३ | किं रे विधो मृगदृ | २८२।१४६ |
| किं कुप्यसि क (भोज ६९) | २४४।२१५ | किं तावत्सरसि (शिशु ८.२९) | ३३९।१०१ | किं वर्ण्यता कुचद्व | १०२।२० |
| किं कुर्वन्त्युपसि | १९७।३६ | किं तिष्ठामि किमु | २८१।१०० | किं वाच्यं सूर्यशशि | ६६।१५ |
| किं कुलेन विशालिन | ३८।३ | किं तीर्थे हरिणा (रसगगाधर) | १७८।१०१८ | किं वाच्यो | २१६।३१ |
| किं कुलेन वि(शा प १४८५) | ३९४।६८१ | किं तृष्णाकारि कीदृ | १९८।४३ | किं वापरेण बहुना | ८७।२८ |
| किं कुलेनोपदिष्टेन शी (मृच्छ.९ ७) | ८३।२ | किं ते धनैर्बन्धु | ३७५।२३९ | किं वाससा तत्र | १७४।८८८ |
| किं कूर्मस्य भर (भर्तृ २ ६९) | ५३।२६९ | किं ते धनै (मा १२.६५६०) | ३८६।३७६ | किं विद्यया कि | १५७।२०० |
| किं कृतेन न (शा प १२२०) | १०१।१२ | किं तेन काव्यमधुना | ३२।२ | किं विश्राम्यति (गीत.६ १२.३) | २५।१७३ |
| किं केकीव शि (शा.प ८८७) | २२८।२२३ | किं तेन किल (शा प.१५१) | ३२।१ | किं वीरूधो भुवि | २४३।१९८ |
| किं केतकीपरिमलो | २२३।४८ | किं तेन जातु जाते (पच १.२७) | ९०।१ | किं वृत्तान्ते परगृ (रसगंगाधर) | १३६।३३ |
| किं ते नम्रतया (नीतिप्र.९) | २३८।७७ | किं शीकरैः कृ (अ शा.२.१८) | ३०५।२३ |