सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
पृष्ठ 456, कुल 516 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 456
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २५
| क्रौञ्च क्रीडतु (शा प ११२७) २९९।८ | क्षणमयमपुवि (शिशु ११ ४८) ३२७।१७ | क्षुद्राः सन्त्रास (सु २२८३) ३६१।४९ |
| केशत्यागकृते ३७६।२५६ | क्षणाहप्रबोवमायाति ९।५२ | क्षुद्रो द्रवैस्य कटुना ५७।१४९ |
| क गन्तासि भ्रा (शान्तिश १ १७)७४।३४ | क्षतातकिल (रघु २ ५३) १५१।३७७ | क्षुद्रोऽपि तनुते तात ८७।१८ |
| क च ननु जनका ९२।६४ | क्षते प्रहारा (पञ्च ४ ६३) १७३।८४४ | क्षुम्पत्प्रत्यर्थिनृपुथ्वी १२२।१६९ |
| क्वचिच्चारुचा १०१।१२ | क्षत्रियस्यो (सूक्ति ९० ३७) १५०।३२१ | क्षेत्रग्राम (प्र ३५) ३७९।८२ |
| क्वचिज्झिल्ल्रीनाद (सु ७२३) २२५।१४० | क्षन्तव्यो मन्द १६६।५६६ | क्षोणी क सहते २०४।१२० |
| क्वचित्कन्था (शा प ४०९८) ३६८।३९ | क्षपा क्षामी (सूक्ति ६१ १८) ३४१।५५ | क्षोणीकाम निजा ११५।३६ |
| क्वचित्कार्यञ्चाञ्ची ५५।७२ | क्षमातुल्यं तपो १६६।६०० | क्षोणीक्राम निजाम् ११५।३७ |
| क्वचित्कृष्णार्जुन २६०।९८ | क्षमा बलमशक्ताना (वृ चा १३ २२)८२।३ | क्षोणी यस्य हिरण्मयी २१५।४ |
| क्वचित्क्वचिदयं २२३।४४ | क्षमा क्षत्रौ च (हि २ १८०) १६४।४९५ | क्षोणीपर्यटनं ३७५।२२९ |
| क्वचित्ताम्बू (अमरु १०७) ३२८।१४ | क्षमाशास्त्रं करे यस्य (वृ चा ३ ३०)८३।१ | क्षोणीपाल त्वदरि १३२।२५ |
| क्वचित्पाणिप्राप्तं ९३।८७ | क्षययुक्तमपि (किरात ० ११) १५१।३८९ | क्षोणीगाश्रयि(भर्तृ स ४७०)१८०।१०४९ |
| क्वचित्पोषोऽपि मित्र ५४।९ | क्षान्त न (भर्तृ स २३६) ३७४।२१९ | क्षोमं वत्ते (शा प ३२८३) २५६।४० |
| क्वचित्पुत्रभ्रष्टै (भर्तृ म ८९) २५३।२९ | क्षान्तिश्चेद (भर्तृ २ १८) १७८।१०१९ | क्ष्वेदाभि क(महावीर ६ ७७) १३१।१९९ |
| क्वचिद्भूमौ शय्या (सु २९४०) ८०।३५ | क्षामक्षामकपोल २७७।५९ | क्ष्वेलातर्जितसिंह १४१।४ |
| क्वचिद्दुष्ट क्वचि (नीतिसार ९) १५७।१७४ | क्षाम गात्रमतीव २८६।२७ | ख |
| क्वचिद्दिद्रोही (भर्तृ २.५१) ८९।५ | क्षार जलं वारि ४९।१७५ | खचितमपि मायावी (सु ३३८) ५६।८४ |
| क्वचिल्लसद्ग (शिशु १७ ५६) १२७।५ | क्षार वारि न २३५।१ | खड्गा नितान्त (सु २३५६) ३६४।४२ |
| क तिष्ठतस्ते पितरौ ४।३० | क्षारो वारिनिधि ५३।२६५ | खड्गनिर्लूनम् (कुमार १६ २६) १२८।११ |
| क दोषोऽत्र मया (सु १४१) ३९।२० | क्षितिप किमपि १३९।६ | खड्गमूलं भवेद्राज्य १५९।२८४ |
| क नु कुलमकलङ्क (भोज ३०४) ९२।६५ | क्षिपसि (सा द १० ५१) ३७३।१७१ | खड्गवारि भवत १२४।२ |
| क पिशुनस्य गति (सु ४३२) ५९।२१९ | क्षिपेदाक्य (शा प १५१२) १५४।६७ | खड्गहस्तोऽरिमा २०८।३४ |
| क प्रस्थितासि (अमरु ७१) २९८।१४ | क्षितो हस्तावलम्ब (अमरु २) ८।१०९ | खड्गा शोणितस (कुमार १६ १५) १२७।७ |
| क यासि (शा प ७४) २३।३४० | क्षिप्रमायमना (हि.२ ९५) १६६।१४४ | खड्गा रुधिरसलिता(कुमार १६ ७) १२७।५ |
| क रुजा हृदय २८२।१२७ | क्षीण क्षीण समी (सु ५४६) २०९।५ | खड्गालक्ष्मीस्तथा (नकुल) १४३।५८ |
| क वन तरु (सा द १० ७०) ९२।६६ | क्षीण (सु १६११) ३०५।११ | खड्गास्तिष्ठन्तु (सु ०२५२) ३६०।४ |
| क वसति लघु १९७।३२ | क्षीणयाव (किरात ९ ६२) ३१६।५४ | खङ्गेन शितधारेण १२८।२२ |
| क वाम्भोद्यौ २१८।७९ | क्षीणांशु (शा प ३७१४) ३०७।५६ | खङ्गेनामूलतो (कुमार १६ ३९) १२८।१७ |
| क स दशरथ (पञ्च ३ २५३)३८४।२७९ | क्षीणो रवि (पञ्च ५ ९०) ३९४।६७९ | खण्डितानेत्ररुञ्जालि २७।१ |
| क्वाकार्यं (विक्रमोर्व ४ ३४) २८१।११३ | क्षीबतासुप (शिशु २० ३४) ३१५।३७ | खद्योतास्तरला भवन्ति २४५।२४१ |
| क्वापि गत २२९।२३६ | क्षीरक्षालितपाश्च ११४।२१ | खद्योतो द्योतते (शा प ७३८) २०९।२ |
| केदानी दर्पितास्ते (सु ५८) १९।४० | क्षीरसागर (शा प ३५१५) २७३।२ | खनन्नाखुबिलं (पञ्च.३ १६) २२९।५ |
| केन्दोर्मण्डलमम्बुधि ८८।२ | क्षीरान्व्हेर्लहरीषु ३०२।१०१ | खर श्वानं गजं मत्तं १५५।९९ |
| कैतद्कारविन्दं ३७२।१३७ | क्षीरिण्य स (मृच्छ १० ६०)३९४।७०६ | खरनखरविमुक्ता (सु ६०५) २४८।९४ |
| कैतनमार्तण्ड ३०३।१२१ | क्षीरेणारमगतो (भर्तृ २ ६७) ८८।२० | खर्वग्रन्थिविमुक्तसंधि २०१।६२ |
| क्षणं सरलवीक्षणं २५६।३९ | क्षीरोदन्व (नैषध १२.७४) ११०।२४१ | खल करोति दुर्यु (हनु १३ ११) ५५।५४ |
| क्षणं कान्ता (सूक्ति अनु ३३) १३२।२० | क्षीरोदीयन्ति १३८।७५ | खल सज्जनकार्पास ५५।६० |
| क्षणं बालो भूत्वा (सु ३१३९) ३६८।३८ | क्षुत्क्षामा शिशव ६७।६६ | खल सर्षपमात्राणि (शा १ ३०६९) ५४।१ |
| क्षण मूच्छमिति २८९।६२ | क्षुत्क्षामाभर्कसञ्च १०१।१ | खल सत्क्रिय (शा प ३७६) ५४।२६ |
| क्षणक्षयिणि साप (सु २९९) ४६।६३ | क्षुत्क्षामोऽपि (सु ६१४) २३०।४० | खल सुजनपैशून्ये (सु ३३५) ५६।८१ |
| क्षणदासाव (का प ४.८२) १०३।७४ | क्षुत्तृडाशा कुद्र ७६।१४ | खलसख्य प्राज्ञात्तुर ४८।१३१ |
| क्षणदृष्टनष्ट (शा प ७६७) २११।१४ | क्षुद्रा सन्ति (शा प ७७३) २३०।३७ | खलाना कण्टकाना (चा नी १५.३) ५४।६ |
| क्षणमपि विरह. (शा प ३४८२) २८८।३५ | क्षुद्रा सन्ति (सु. २८५) ५२।२५७ | खलाना धनुषा (वृ चा १४ ८५) ५४।१२ |
| क्षणमप्यनु (भोज २४२) १०२।४७ | खलास्तु कुशला (रसगगाधर) ५४।३६ |
४ सुभा०अनु०