सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
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| श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| गाढालिङ्गन (शृङ्गारति २१) | ३१।१३९ | गुणवद्भि सह सगम | ६२।१२ | गुरुतरकल नूपू (शिशु ७ १८) | २६९।४२५ |
| गाढाश्लेषनिपीडना (सु २०८२) | ३२९।४३ | गुणवन्त (शा प ३०३) | ८२।३४ | गुरुतामुपयाति यन्मृ(शा प ३९८) | ७३।२६ |
| गाढाश्लेषविशीर्ण (अमरु ७४) | ३२९।२२ | गुणवानपि नोप | १७५।९३४ | गुरुत्रासादासादितभ | ३२८।२ |
| गात्रं कण्टक (शा प १०४२) | २४२।१६१ | गुणवान्सुचिरस्थायी (दृ श ६५) | ८२।३० | गुरुपत्न्या निशावी (कथाणंव) | १५०।१७५ |
| गात्रं ते (शा प ८८०) | २२८।२१४ | गुणा कुर्वन्ति (शा प २९०) | ८१।१ | गुरुभिर्द्विजाती (वृ चा ११ ८) | १६९।७१५ |
| गात्रं सकुचितं (शा प ४१६१) | ९६।१६ | गुणा सर्वत्र (चा नी १६ ७) | ८१।५ | गुरुरपि लघूपनीतो | ८७।२२ |
| गानान्धैस्तु परं पारं | ८४।२ | गुणागारे गौरे यशसि | १३९।७ | गुरुरेक कविरेक सदसि | १०१।६ |
| गान्धर्वं गन्ध (भर्तृ स ४८५) | १५९।२६६ | गुणा गुणज्ञेषु (गुणरत्न ५) | ८२।४० | गुरुनयं भार (शा प ९६६) | २३४।१४४ |
| गान्धारा गुप्तदारा | १२६।२१ | गुणानर्चन्ति जन्तूना (दृ.श ८४) | ८२।२८ | गुरुशुश्रूषया वि (विक्रम १२८) | १५९।१५७ |
| गाम्भीर्येण (काव्या २ ८५) | १२०।१४७ | गुणाना सा (सु ४५१) | ६०।२५३ | गुरुषु मिलितेषु | २४७।६८ |
| गायति गीते शसति | २८८।११ | गुणानामज्ञाता प्रचुरधन | ८२।४५ | गुरुसमीरसमीरितभू | १२९।५१ |
| गायति हसति (शा प ५७९) | २०८।३० | गुणानामज्ञानादनु | २४६।३३ | गुरुस्कुर्वन्ति ते (किरात ११ ६४) | ७९।१३ |
| गायन्तीना गोपसीम | २२।१२३ | गुणानामन्तर (दृ श २२) | १६८।६७२ | गुरो सुता मि (पच २ ११४) | १६५।५३० |
| गायन्तु (सु २४१४) | ११८।१९९ | गुणानामेव (स क ४ १२५) | २३४।१४० | गुरोरधीताखिलवैद्यविद्या | ४३।१ |
| गावो गन्धेन (विक्रम ११७) | ३८३।२६८ | गुणान्भूषयते रूप | १५९।२५९ | गुरोरप्यवलिप्त(भा १ ५५९५) | १६७।६३४ |
| गाहन्ता महिषा (अ शा २ ६) | १४।१९ | गुणापवादेन (किरात १४ १२) | ५९।२२३ | गुरोगिर पञ्च दिना (लटक २ १४) | ४३।२ |
| गिरयो गुरवस्तेभ्यो | ४७।१०५ | गुणायन्ते (गुणरत्न ६) | ५१।२३६ | गुह्यमैथुनध (चा नी ६.१९) | १६२।४०२ |
| गिरयोऽप्यनुन्नति | १०३।७६ | गुणालयोऽप्य (पच १ ४१५) | १४९।३०२ | गूढालिङ्गनगण्डचुम्बन | २९२।३१ |
| गिरा देवी वीणागुण | ३५।१५ | गुणाश्रयं (हि २ ११७) | ३४९।६२ | गृध्राकारोऽपि (पच १ ३२५) | १५०।३४३ |
| गिरिगहरेषु गुरुगर्व | २३१।६७ | गुणिगणगण (हि १ १०८) | ४०।२६ | गृहमध्यस्य खा (पच २ १५४) | ७१।२७ |
| गिरिर्महानिगिरेरब्धि (कुव १०८) | ७६।१३ | गुणिने समीपवर्ती (सु २४७) | ४८।१४५ | गृहिणी सचिव (रघु.८ ६७) | ३६२।१५ |
| गिरौ मयूरा (नीतिसार १) | १७३।८६६ | गुणिन जनमा (शा प २९६) | ६२।२ | गृहीत ताम्बूल (शा प.३४७५) | ३८९।५७ |
| गीतं कोकिल ते | ९४।१०५ | गुणिना गुणेषु | ५६।१२१ | गृहीता पाणिभि(कुमार १६ १४) | १२७।६ |
| गीतशास्त्रविनो (शा प २०२) | १५३।२३ | गुणिना निर्गुणाना | १५६।१६० | गृहे जानुचर कल्या | ८९।२ |
| गीतान्तरेषु (कुमार ३ ३८) | ३३१।३३ | गुणिनामपि निरूप (वासव ८) | ४८।११८ | गृहेश्वरी (स्कान्द मा कौ १४) | ३८९।४८१ |
| गीत्वा किमपि (शा प ५२२) | १८५।३० | गुणिनेि गुणज्ञो रमते (सु २५३) | ८१।३५ | गृहन्तु सर्वे यदि वा (कुव ७३) | ३८।१९ |
| गीयन्ते यदि पन्न | १३७।६५ | गुणिनोऽपि हि | ८१।२४ | गेह दुर्गतबन्धुभि | ५३।२७५ |
| गीर्भिर्गुरुणा परु (रसगगाधर) | १७३।८६० | गुणी गुण वेत्ति (गुणरत्न ४) | १७५।९२७ | गेहादङ्गणमङ्ग (शा प ३४७८) | २८९।६७ |
| गीर्वाणा प्रतियन्ति | ३६५।८ | गुणेन स्पृहणीय (गुणरत्न १३) | ८१।१८ | गेहे गेहे सुभग | ११९।१२७ |
| गुजति मञ्जु मिलिन्दे (रसगगाधर) | २३९।८१ | गुणेषु क्रियता (शा प २९८) | ८१।१२ | गैरिकमन शिलादि | १९६।१३ |
| गुञ्जन्ति प्रतिकुञ्ज | २८५।३९ | गुणेषु यत्न (मृच्छ ४ २३) | ८२।४१ | गोकर्णं गाहमाना | ३४२।८० |
| गुणं पृच्छख मा | १६७।६४५ | गुणेष्वेव हि (मृच्छ ४ ०२) | ८१।१० | गोकर्णराडाभरणं य | १९०।६५ |
| गुण आकर्षणयोग्यो | ८२।३२ | गुणे पूजा (दृ श ७१) | ८१।२६ | गोगजवाहनभोजन | १९०।६३ |
| गुणग्रामाभिसंवादि(प्र राघव १ ५) | ४५।११ | गुणे सर्वज्ञक (चा नी १६ १०) | ८१।११ | गोत्रस्थिति न मुञ्च (शा प २४१) | ४६।४८ |
| गुणदोषावनिधि(हि २ १४३) | १६४।४८९ | गुणैस्तुङ्गता (चा नी १६ ६) | ८१।१६ | गोत्राचारविचारपा | ११६।६० |
| गुणदोषावशास्त्रज्ञ (सु ३४९) | ५६।९१ | गुणैर्गौरवमायाति (शा प २९९) | ८१।१३ | गोत्रे साक्षादज(सूक्ति ७४ १२) | ३१३।५९ |
| गुणदोषौ बुधो (कुव ६) | ३८।१० | गुणो गुणान्तरा (चा नी ५ ६९) | ८१।२५ | गोनासाय नियोजिता (विद्ध १ ३) | १२।३३ |
| गुणभेदविदग्रिम | १०४।९१ | गुणो दूषणता या (शा प.३०४) | ८१।१५ | गोपायन्ती विर(शा प ३४२१) | २८६।१५ |
| गुणमधिगतमपि | १६९।७३१ | गुणोऽपि दोषता याति | ९१।२५ | गोपालेन प्रजा(पच १ २४१) | १४९।२९१ |
| गुणयुक्तोऽपि पूर्णोऽपि | ८१।२० | गुणोऽपि नून दोषाय | ४६।५१ | गोपालो नैव गोपा (शा.प ५१६) | १८४।३ |
| गुणयुक्तोऽप्यधो (शा प ३४४) | ८१।२३ | गुणो भूष्यते (चा नी ८ १४) | १७७।६४६ | गोभि क्रीडितवान्कृष्ण | ६२।४ |
| गुणराणिमहाभार (सु २१६) | ४६।७३ | गुम्फ पङ्कजकुञ्जलयुति | ३१।४७ | गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च | ८३।३ |
| गुणवज्जनसंपर्कार्याति (सु २१८) | ८१।२ | गुरु प्रयोजनोद्देशा | १६९।७१४ | गोवर्धनोद्धरणहृष्ट (सु ३४) | २२।१२८ |
| गुणवतस्तव हार न | २४६।२५ | गुरुणा स्तनभारे(सूक्ति.५४.९४) | २७०।३ | गोष्ठेषु तिष्ठति पतिर्व | ३५२।३१ |
| गुणवद्गुणवद्वा (भर्तृ २.९७) | ९३।८२ | गौरमुग्धवनिताव | २६८।३६७ |