सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| २८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
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| गौरव प्राप्यते दा (सूक्ति.१८६.३) ६९।७ | घनैर्विलोक्य (कुमार १४ ३५) १२८।३९ | चण्डीजङ्घाकाण्ड ११।८ |
| गौराङ्ग्या भुजला २६४।२३६ | घनोद्यमे गाढतमेऽ ३४०।१८ | चण्डीशचूडाम(सा द ७ १२) २८२।१४४ |
| गौरीक्षण भूवरजा १९०।६९ | घनोऽय चेदभ्रेदुपरि २७६।३५ | चतुर सृजत (शा प १४९३) ३४८।१० |
| गौरी चम्पककलि(शा प ८१६) २२३।४८ | घर्मार्ति न तथा सु (हि १.९७) ५३।२६१ | चतुरङ्गबलो राजा ४४।१ |
| गौरीचुम्बनचञ्चल (लटक १ १) ७।८८ | घासग्रास गृहाण (शा प ९२८) २३३।९७ | चतुर्थैऽहि ह्ला (शा प ३७५८) ३५१।३३ |
| गौरीतनुर्नयनमायत ३६५।४४ | घूर्णन्ते तूर्णमेतत्कु १२६।२४ | चतुर्मुखो न च ब्रह्मा १८५।२४ |
| गौरीनखरसादृश्य(शा प ५३५) १९४।१८ | घृतकुम्भसमा (पञ्च सू ५४) १६२।४०८ | चतुर्ष्वपि समुद्रे (शा प ४०२४) ३६२।३ |
| गौरीपतेर्गरीयो गरल ४७।१५ | घृत न श्रूयते कर्णे १८१।१४ | चत्वार प्रथयन्तु (प्र राघव १ १)१५।३२ |
| गौरीव पत्या सु(नैषध ७ ८३)२६५।३४९ | घृतलवणतेलतण्डुल (सु ३१८८) ६६।३९ | चत्वारो धनदा(भर्तृ स ४९०)१५६।१६४ |
| गौर्गौ कामदुघा १६६।६०८ | घृष्टं घृष्टं पुनरपि पु ५१।२२९ | चत्वारो वयम् (वेणी १.२५) ३६१।४४ |
| ग्रन्थिमुद्ग्रथयि (शिशु १० ६३) ३१५।२४ | घ्रात तालफला(सूक्ति ९७ ७२)१३२।३५ | चत्वार्याहु (भा २ २२७०) ३८०।१४५ |
| ग्रसति कोऽपि विमो २७८।३५ | घ्रात्वा श्रोणीम (शा प ५८६) २०७।१८ | चन्दन शीतलं लोके ८६।६ |
| ग्रसमानमिवौजसा (किरात ११ ५३) ७७।४ | च | चन्दन स्तनतटे (शा प ३७३९) ३२८।७ |
| ग्रामतरुण तरु (काव्याल ७ ३९)३५१।२० | चकितहरिणलो(का प्र १० ८७)३५०।४२ | चन्दने विषधरा (भल्लट ३२) २४२।१६५ |
| ग्रामाणासुपशल्य (शा प ९१३) २३०।४२ | चकोरनेत्रेण दृगु (नैषध ७ ३२) २५९।८६ | चन्द्र समाश्रयति २१०।२९ |
| ग्रामेऽस्मिन्पथि (अमरु १३१) ३७३।९२ | चकोराणा चन्द्र १०६।१५५ | चन्द्र चन्दनकर्द (सूक्ति.४४ ९) २९०।८२ |
| ग्रामेस्मिन्प्रस्तर (कुव.१४९) ३५४।६७ | चक्रे सेव्यं नृ (शा प १३७८) १४६।१६१ | चन्द्रं चन्द्रार्धचूड ११४।२८ |
| ग्रावाणो मणयो (भल्लट ५०) २१६।२६ | चक्र पप्रच्छ पा (शा प १२६१)११४।२६ | चन्द्रं कलङ्करहित २६२।१८६ |
| ग्रासादर्थमपि ग्रास (पञ्च २.७३) ६९।६ | चक्रवरोऽपि सुरत्व ७६।३२ | चन्द्र क्षयी प्रकृति(विक्रम ९३) ५०।१९४ |
| ग्रासाद्गलितसि (शा प १२०८) २३१।५७ | चक्र ब्रूहि विभो गदे १५।३८ | चन्द्रकान्तगलदम्बुना ३२३।७ |
| ग्रीवाद्धतैर्वावड(नैषध ७ ६६) २६६।३०६ | चक्राङ्गो विरही (शा.प ३५९५) २९६।१० | चन्द्रपादजनित (कुमार ८ ६७) २९९।३० |
| ग्रीवाभङ्गाभिराम (अ शा १ ७) २०७।७ | चक्रीकृतभुजलता २६९।४२६ | चन्द्रबिम्बरविविम्ब ३४०।३ |
| ग्रीवास्तम्भभृत (शा प २०७) ४१।६५ | चक्री चकारपङ्क्तिं (सूर्यशतक.७१)२७।१४ | चन्द्रखण्डकरायते (शृङ्गारति १६) २७४।८ |
| ग्रीष्मादित्यकरप्र (शा प ५८८) २०८।२७ | चक्री त्रिशूली न हरो १८५।३५ | चन्द्रश्चन्दनमिन्दुरि १३७।५९ |
| ग्रीष्मे ग्रीष्मतरै २९१।४२ | चकुरेव लल (शिशु १० ६६) ३१७।२७ | चन्द्रादित्योरिनेत्र १७।१३ |
| ग्रीष्मोष्मप्लोष(श प ३८५५) ३४०।१२९ | चक्रे चण्डरुचा समं ३४६।३२ | चन्द्राद्भूत्यकमण्डलो १३७।६० |
| ग्लानिच्छेदि क्षुत्प्र १३०।१०६ | चक्रेण विश्व यु(नैषध ७ ८९) २६८।३७८ | चन्द्राधिकैतन्मु(नैषध ७ ४४)२६१।१५६ |
| घ | चक्षु पूत न्य (शा प ४५५१)१५६।१४१ | चन्द्राननार्यदेहाय ३।४ |
| घट भिन्यात्पट(शा प १४६८) १५४।५० | चक्षु प्रीत्या (सूक्ति ७५ १०) २९५।१२२ | चन्द्रायते शुक्(काव्याल ८ २८)३४४।१६ |
| घटन विघटनमयवा (सु २३९७)७०।२८ | चक्षुर्जाड्यमपैतु ३०७।५८ | चन्द्रे शीतलवल्यली ३४६।२० |
| घटमानकोककुचमाम् ३२७।६ | चक्षुर्मेचकसम्बुज २७२।५७ | चन्द्रो जड कदलि २५३।२२ |
| घटितमिवाञ्जन (सा द १० ४५) २९७।६ | चक्षुर्लुप्तमपीकणं (सूक्ति ५८.७) ३११।२५ | चन्द्रोदये चन्दनमङ्ग २९८।११ |
| घटीयन्त्रायते हारी २६६।३०० | चञ्चच्चन्दनखाग्रभेदवि १९।५० | चन्द्रो द्वादश भास्कर २९२।३५ |
| घटो जन्मस्थानं (शा प ५०५) ५२।२५४ | चञ्चच्चन्द्रिकचन्द्रचारु ६।७४ | चन्द्रोऽनेन कलङ्कि १२२।१७४ |
| घण्टानादो नि (शिशु १८ १०) १२९।५७ | चञ्च्चेलाव्रला (शा प ३९२६) ३४७।४२ | चपलतस्तरङ्गै (शा प १०९२) २१६।२१ |
| घण्टारवै रौद्रत(कुमार १४ ४७)१२९।४८ | चञ्चत्कर्पूरचौरा(शा प.३८१२) ३२७।३९ | चपलबृदये कि (अमरु ५६) ३०८।११ |
| घनघनमपि दृष्ट्वा (शा.प ३५७३)३०९।१ | चञ्चत्काञ्चनशैलाव २६५।२७० | चरणकमलदासस्त्वे ३०६।३४ |
| घनघनाघनकान्ति १९५।०४ | चञ्चद्देवेन्द्रकुञ्जरथलि १०।१६० | चरणकमल तदीय २६९।४०९ |
| घनतरघनवृन्दच्छादिते ३४१।५० | चञ्चद्रादशमील (शा प ५३२) १९१।८६ | चरणपतनप्रत्याख्या(अमरु ५०) ३५०।५० |
| घनतरघनवृन्दच्छा ३४१।५१ | चञ्चद्धुजभ्रमितच (वेणी १ २१) ३६७।३ | चरमगिरिकुरङ्गी (सूक्ति ८२ २५) ३२२।७ |
| घनतरतिमिरघुणो(सूक्ति ६१ १३) २९९।१ | चञ्चरीक चतुरोऽसि २२३।६७ | चरमगिरिनिकुञ्जमु २९७।२२ |
| घनसन्तमसमली (भल्लट. १८) २२९।२३५ | चञ्चल वसु (किरात १३ ५३) १५१।३९३ | चराचरजगत्स्फार (रसगङ्गाधर) १।८ |
| घनसमयमहीभृत्प ३४१।४९ | चटचटिति चर्म (शा प.१२६) १९।४८ | चरेद्धीमानकण्टको १५०।३३८ |
| घनसमये शिखिषु २००।४२ | चण्डचाणूरदोर्द (सु ३३) २२।१०५ | चर्मखण्ड द्विधा(भर्तृ.३ १७) ३७१।१२३ |