सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां || | :--- | :--- | :--- | | ३४ |||
| त्यजेद्धर्मं दया (वृ चा ४.१६) ३८८।४३१ | त्वत्कीर्तिराजहंस्या १३४।७ | त्वय्यागते किमिति (कुव २०) १२५।७ |
| त्याग एको गुण श्लाघ्य ६।४ | त्वत्कीर्तिर्धनिका १२१।१५४ | त्वा चित्तेन (गीत ११.२२ १) ३०८।१९ |
| त्यागभोगविहीनेन (शा प ३८५) ७१।५ | त्वत्खङ्गखण्डित (रसगगाधर) ११४।२४ | त्वा पातु नीलन २२।१२६ |
| त्यागो गुणो गुण(विक्रम १९६)३८३।२६९ | त्वत्खड्गाघातजात १३४।२८ | त्वामजनीयति २८८।४४ |
| त्यागो गुणो वित्तवता (सु ५०८) ७०।१८ | त्वत्तेज प्रतिभाम १३७।५८ | त्वाम (गीत पा १२ २४ ९) २५१।७७ |
| त्याज्यं न धैर्यं(पच १ २१६)१७२।८४१ | त्वत्पत्रमुक्तविशि १३०।१०९ | त्वामयमाबद्धाञ्जलि (दशकु उ २) ३०५।९ |
| त्याज्यं सुखं (प्रव २९) ३८३।२७० | त्वत्प्रतापतपनातपतस १३२।६ | त्वामालिख्य (मेघ २ ४४) २९२।५४ |
| त्रयोऽप्यन्यत्रयो (शा प १७४) २५।२० | त्वत्प्रतापानर्घहेम १३३।४ | त्वामुदर साधु म (शान्ति.१ २४)७६।३० |
| त्रय्यन्तसिद्धान्जन ३६७।२४ | त्वत्प्रत्यर्थिवधूंघरे (कुव १७१) १३२।३६ | द |
| त्रात काकोदरो येन (कुव ६५) २१।९६ | त्वत्प्रारब्धप्रचण्ड ११२।२८० | दंष्ट्रासङ्कटवक्त्र (शा प ४०६६) ९९।५१ |
| त्रातुं लोकानि(सूक्ति १०९ ७)१०७।१७६ | त्वदङ्गमार्दवे दृष्टे कस्य (कुव ४५)३१२।८ | दक्ष श्रिय (हि ३ ११३) १७०।७७४ |
| त्रासहेतोर्विनी (हि २ १२३) ३८८।४२८ | त्वदरिनृपतिकेली १३१।१३ | दक्षता भद्र (काम नी ५ १५) ३८५।३३१ |
| त्रिजगद्दहनल्लङ्घन १३५।१८ | त्वदरिनृपतिमाशा १३१।१२ | दक्षिणाशाप्रवृत्तस्य (शा प ३९७) ७३।३ |
| त्रिनयनचूडारत्न (शा प ५४१) २९९।११ | त्वदीयमुखपङ्कज २९१।१३ | दग्धं खाण्डवमर्जुन ६७।६७ |
| त्रिनयनजटा (शा प ३६३०) ३०१।८४ | त्वद्वाणेषु यमो १०९।२१८ | दग्धं दग्धं (महा ना २५२) ३८६।३६२ |
| त्रिलोकेश शार्ङ्ग (विक्रम २२९) २३।८९ | त्वद्वाहोद्भूतधूल्य ११४।२२ | दग्धा सा (शा प ८३२) २२४।१०३ |
| त्रिविक्रमोऽभूद् (नीतिसार ५) १७३।८७५ | त्वद्यशोजलधौ (भोज २०९) ११७।८१ | दग्धो विधिर्वि (शा.प.३२६५) २५३।८ |
| त्रिविधा (शा प १३६६) १४६।१५५ | त्वद्रूपामृतपान (सूक्ति ४५ ७) २९२।२९ | दत्तं मया २६७।२५८ |
| त्रैलोक्यत्राण (शा प ४०८४) ३६६।१२ | त्वद्वक्त्रसाम्यमय (कुव ९०) ३१३।५६ | दत्तमात्तवदनं (शिशु १०.२३) ३१५।२६ |
| त्रैलोक्यभूषणमणि (सु १८३) ३३।४० | त्वद्वर्तुलस्थुलसुवर्ण ३१३।४१ | दत्तमिष्टतमया (शिशु १० ६) ३१४।९ |
| त्रैलोक्याभयलग्न १११।२५४ | त्वद्वाजिराजिनिर्धूत १२५।३ | दत्ते जनोऽसौ खलु ३३१।१८ |
| त्रैलोक्ये नोप १८७।२० | त्वद्विरहमसहमाना १८९।५२ | दत्तोऽस्या (अमरु ६) २९९।९६ |
| त्रोटीपुट करट २२८।२११ | त्वद्विरहे विस्तारितर २८८।१४ | दत्त्वा कटाक्ष (सा द १० ८०) २७७।१० |
| त्वं चेत्कल्पतरुर्वयं १२१।१५२ | त्वद्वैरिणो वीर (शा.प १२७८) १३१।७ | दत्त्वा दिशि (शा प.४०३७) ३६४।२३ |
| त्वं चेत्सचरसे(काव्यप्र.१० ४३) २४५।५ | त्वद्वैरिवनचलि ११८।१९८ | दत्त्वा धैर्यभुजंग ३५८।७८ |
| त्वं चेज्जीवजनानुराग ८०।४१ | त्वन्मुखं कम(काव्या २ १९०)३८७।४१२ | ददत मन्तरिता (शिशु.६.४१) ३४४।२९ |
| त्वं जामदग्न्य जन २४५।७ | त्वमद्य सिन्धो २१६।१३ | ददतो युच्य (भोज १०५) १५९।१९२ |
| त्वं तावद्वहुवल्लभ (शा प ३५७१) ३०९।३ | त्वमिव पथिक (रसगगाधर) ३५४।७० | ददाति प्रति (पच २ ५१) १६०।३०६ |
| त्वं दूति निरगा कुञ्ज २९३।४ | त्वमुचितं नयना २८२।१३४ | ददृशेऽपि (शिशु ९ २३) २९७।१९ |
| त्व दूरमपि गच्छन्ती २९१।१ | त्वमेव चातका (शा प ७८२) २११।५ | ददौ रसात्पङ्कज (कुमार ३.३७)३३१।३२ |
| त्व दित्राणि पदानि (सु २५१६) ११३।८ | त्वमेव (सर्वस्वटी १६ ७५१) ३९४।७०५ | दद्यात्साधुर्यदि (पच १ ३९७)१७८।९९९ |
| त्वं नो गोत्रपति १८३।६७ | त्वमा नीलो (काव्या २ १०६)३८७।४२६ | दधति कुहर (मालती ९.६) १४।१३ |
| त्वं पीयूष दिवो २६१।१५४ | त्वया मम समेतस्य २९१।३ | दधति तावदमी (शान्ति २ ५) ३६८।३७ |
| त्वं भो शंभोर्निंब २१०।३४ | त्वया वीर गुणाकृष्ट्या १०१।४ | दधति न जनास्तस्मै (सु ३१९०) ६७।६१ |
| त्वं मुग्धाक्षि (अमरु २७) ३२०।४९ | त्वयि दृष्ट (का प्र.१०.४५५) २८८।२२ | दधति स्फुटं (शिशु ९.६६) २८८।३० |
| त्वं राजा वय (शा प २०४) ८०।४२ | त्वयि दृष्टे (सा द १०.५०) २८७।२ | दधत्यधरचुम्बनं ३४७।४४ |
| त्वं विनिर्जितमनो २८८।३४ | त्वयि निबद्धरते ३०५।१८ | दधान प्रमाण(भामिनी अ ३१) २३८।७३ |
| त्वं सामान्यतरु २४०।१३१ | त्वयि प्रचलति प्रभो १२५।८ | दवि मधुर मधु १७०।७६६ |
| त्वत्क्षांसुरुधिर ३७१।१२२ | त्वयि लोचनगोचरं (कुव १७१)११५।४२ | दधौ हरि कं शुचि २००।५२ |
| त्वच समुत्तार्य २५९।८५ | त्वयि वर्षति (भोज १८७) २११।३ | दन्तप्रभा (सा.द १०.५६) २७०।७ |
| त्वञ्चित्ते भोज ११७।७४ | त्वयि सगर (सा द.१० ७७) १०२।४० | दन्तस्य निष्कोष (पच १ ७७)१७२।८३७ |
| त्वच्चिन्तापरिकल्पितं २९०।७१ | त्वयि सति शिवदातर्य (कुव ५४) ७०।३७ | दन्ता सप्त (शा प ९६४) २३५।१४६ |
| त्वत्कीर्तिं शशिन १३७।६९ | त्वय्यधर्मासनभाजि ३६१।४१ | दन्ताग्रनिर्भिन्नाहि (शिशु १२ ४७) २।१८ |
| त्वत्कीर्तिर्मौक्तिक १३५।१९ | दन्ताश्चलेन धरणीत २।१९ |