सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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सस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः ३३
| प्रथम स्तम्भ | द्वितीय स्तम्भ | तृतीय स्तम्भ |
|---|---|---|
| तावत्कोकिल (भामिनी.अ ६) २२५।१२७ | तुङ्गात्मना तुङ्गतरा (सु २५९) ४९।१६४ | तृष्णे देवि नम (पच ५.७७) ७६।८ |
| तावत्सप्तसमुद्र (शा.प.१०९७) ७।९६ | तुङ्गाभोगे स्तन २६६।३२१ | ते कौपीन (शा प १२२४) १०८।१९४ |
| तावत्सन्ति सहाया (सु ३१८३) ६६।३७ | तुच्छान्तरराध्यास १०४।१०७ | ते क्षत्रिया (शा प ३९७९) ३६०।२१ |
| तावत्सर्वगुणालय ७४।४१ | तुभ्य दासेर (सूक्ति २४ १) २३४।१२६ | ते चापि (मा १२ १२५४२) ३८०।४०६ |
| तावत्स्यात्सर्वं (पच २ १५०) १६५।५३४ | तुरगशतसहस्रं गो(पद्मप्रसङ्ग १४) ६९।२६ | तेज क्षमा (शिशु २.८३) १४७।१८५ |
| तावत्स्यात्सु (पच ५.६२) ३४९।३३ | तुरङ्गसादिनं श(कुमार १६ ४३)१२८।२० | तेजस्विनि (शा प १३३९) ७९।९ |
| तावदाश्रीयते (किरात ११ ६१) ७९।११ | तुरङ्गी तुरगःरू(कुमार १६ ४१)१२८।१९ | तेजस्विमध्य (शिशु २ ५१) ७८।६ |
| तावदेव कृतिना (भर्तृ स.७७) २५१।३३ | तुलाधारो वाता १०६।१६२ | तेजांसि यस्य प्रथमं २२७।३ |
| तावदेव विदुषा २५१।३१ | तुलामारुह्य रवेिणा (सु २४०८)१०१।११ | नेजोजहीने महीपाले ७९।१० |
| तावद्गर्जन्ति (सु ५८८) २३५।१६१ | तुल्य परोपतापित्व ४६।६६ | ते तीक्ष्णदुर्जंन ३६८।३५ |
| तावद्गर्जन्ति (शा प १५७४) १४३।४९ | तुल्यं भूमृति (शा प १२०४) ९४।११२ | ते ते चातकपोतका २१३।७० |
| तावद्गुणा गुरुत्वं च (सु.३२५२) ७६।२६ | तुल्यरूपमसि (किरात ९ ६१) ३१६।५३ | ते दह्निमात्र (का प्र ६ १४०) ५९।२३४ |
| तावद्व्याद्धि (हि १ ५७) १६४।५०० | तुल्यवर्णच्छद (भोज २६९) २२८।२०५ | ते धन्या पुण्यभाजस्ते ७५।९ |
| तावद्विद्यानवद्या गुणगण ८९।४ | तुल्यार्थं (पञ्च १ २७१) १४६।१५६ | ते धन्यास्ते (पच १ २८५) ३२।९ |
| तावन्महता महती ७३।२५ | तुल्येऽपराधे (शिशु २ ४९) ७८।४ | तेऽनन्तवाङ्मयमहा (सु १८२) ३३।२९ |
| तावन्महत्त्वं (भर्तृ स २५१) १६६।५९४ | तुषारधवल स्फूर्ज १९५।२ | तेनाधीत श्रुत तेन ७६।११ |
| तावन्मौनेन (वृ चा १४ १८) २२५।१२१ | तुष्यन्ति भोजनै(चा नी.६ ९)१५९।२७२ | ते पिबन्त. (मा ३ १२८५७)३९३।६५२ |
| तास्तु वाच सभायोग्या (प्र भ ८) ८४।१ | तुष्यन्तु मे छिद्रम २८७।३ | ते भूमिपतयो जयन्ति ३४।५५ |
| तिग्मरुचिप्रतापो(का प्र ४ ५५)१०३।७२ | तूणीरबन्वपरिणद्ध १२७।१८ | ते मीमांसाशास्त्रलोक ४३।१ |
| तिमिरेऽपि दूरदृश्या ३५२।१८ | तूणेव मधुमासे १९४।३५ | ते मूर्खेतरा लोके (सु ४८३) ७२।४५ |
| तिरोहितान्तानि (किरात ८ ४७)३३८।९० | तूर्णं चाहं वरं मन्ये नरा ७४।४ | ते वन्द्यास्ते कृति (भोज १२१) ४८।१३६ |
| तिर्यक्कण्ठ (गीत ३ ७ १६) २५१।७० | तूर्णं ब्रह्मविद (चा नी ५ १४)१६७।६३३ | ते साधवो भुवन (पद्म उ ३७ ७) ५०।२१३ |
| तिर्यक्त्वं भजतु ६३।३५ | तृणमुखमपि न २३३।१०० | तै सर्वैज्ञीभवद ३०१।९० |
| तिलार्धं स्वीय (चाणक्य ६६) ३९४।६८९ | तृणादपि लघुस्तूल (शा प ४००) ७३।५ | तोयं निर्मथितं घृताय ४१।६९ |
| तिष्ठता तपसि पु (किरात.१३ ४४) ८३।१ | तृणानि नोन्मू (पच १ १३३)१७४।९०७ | तोयानामधिपति २१६।१५ |
| तिष्ठार्जुनार्थ सङ्ग्रामे १८१।५ | तृणानि भूमि (पच १ १८४) १६३।४४४ | तोयैरल्पैरपि (भामिनी अ २८) २४७।४७ |
| तीक्ष्णं रविस्त (शा प ३९०७) ३४५।३९ | तृणैरावेष्ट्यते रज्जु १४४।८४ | त्यक्त जन्म (सु ६५४) २३३।११८ |
| तीक्ष्णधारेण खड्गेन ७३।१५ | तृणोल्कया (मा ५ १२३०) ३८८।४३७ | त्यक्तप्राणं (शिशु १८.६१) १३०।९१ |
| तीक्ष्णाग्रहेतिहतिभिः १४३।५६ | तृप्तियोग (शिशु २ ३६) १४६।१८३ | त्यक्तो विन्ध्यगिरि २७०।९३ |
| तीक्ष्णादुद्विजते मृदौ(मुद्रा ३ ५) ६३।३२ | तृप्त्यर्थं भोजनं १६६।५९८ | त्यक्त्वापि निज ५६।११७ |
| तीक्ष्णा नारुंतुदा (शिशु २ १०९) ८५।२ | तृप्त्या नद्य कमल २१३।५८ | त्यक्त्वा युवा ६४।१४ |
| तीक्ष्णोपायप्रान्तगम्योऽपि ३९४।६८३ | तृषा धराया (शा प १०८८) २१६।१२ | त्यक्तवालसान् ३८५।३१७ |
| तीरस्थलीबर्हिभि (रघु १६ ६४) ३३७।६५ | तृषार्ते सारङ्गे (शा प १२०५)५२।२४४ | त्यज किंशुक २४२।१६८ |
| तीरात्तीरमुपैति (शा.प ३५९७)२९६।११ | तृषा शुष्य (शा प ४१४८) ३७१।१३१ | त्यज चक्रवाकि २२७।१७९ |
| तीर्थसेवनमौ (राजत ६ ३०९)३८०।४२४ | तृष्णाखनिरगाधे(सूक्ति १२६ २) ७५।२३ | त्यजत मानम (रघु ९ ४७) ३३२।५७ |
| तीर्थस्थित (राजत ५ ३०४)३९४।६७४ | तृष्णा चेह परित्यज्य (हि १.१९०)७५।३ | त्यजति च गुणा ५७।१५० |
| तीर्थनामवलोकनं परि ९८।६ | तृष्णा छिन्धि भज(भर्तृ स.४४)५३।२७३ | त्यजति (शा प १५४५) १६९।७२८ |
| तीव्रे तपसि (शा प.१५१६) १५४।७१ | तृष्णापहारी विमले १०२।२२ | त्यज निज (शा प.११०४) २१८।६९ |
| तीव्रो निदाघस (शा प ९७५) २३६।८ | तृष्णाकोल (रसगगाधर) २६१।१०१ | त्यजन्ति मित्राणि (वृ चा १५.५) ६४।१० |
| तीव्रोऽयं नितरा २३७।३० | तृष्णा हि चेत्परित्य (हि १.१९०)७६।१८ | त्यजसि यदपि १३५।२४ |
| तीव्रोष्णदुंविषहवीर्य ७९।१९ | तृष्णे कृष्णेऽपि ते ७५।२ | त्यजेत सचयास्त(मा.३ ९४) ३८८।४३२ |
| तुङ्गत्वमितरा (शिशु २ ४८) ७९।१५ | तृष्णे त्वमपि (शा प ४२४) ७५।७ | त्यजेल्लघुधातौं १७२।८३८ |
| तुङ्गब्रह्माण्डसिंहासन १३८।८९ | तृष्णे देवि (शा प ४२०) ७५।१ | त्यजेत्स्वामिनमप्यु १५७।२०२ |
| ५ सुभा०अनु० | त्यजेदेकं (चा.नी.२.१०) १५३।३३ |