सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | ||
|---|---|---|
| ७० |
| प्रथमः स्तम्भः | द्वितीयः स्तम्भः | तृतीयः स्तम्भः |
|---|---|---|
| विधाय वैरं (शिशु २ ४२) १५०।३५२ | विपन्नलेखा निर ३३८।८३ | विरलविरली (शा.प.३७१८) ३२४।४१ |
| विधायापूर्वं (रत्ना २ ८) २६२।१६४ | विपरीतमावेप (सूक्ति ७९ १) ३२०।३ | विरला जानन्ति १७०।७६१ |
| विधायालीक ३४८।४ | विपश्चिताम ३६४।१ | विरलातपच्छ (शिशु ९.३) २९४।३२ |
| विधि किमस्या २५७।१८ | विपाकदारुणो (प्रव ३१) १४९।३०९ | विरहविदित ३५९।८२ |
| विधिना मन्त्र (पञ्च १ २३९) १४९।२८९ | विपाण्डुभिम्ली (किरात ४.२४) ३४४।२० | विरहविषम काम (अमरु ६७) २८९।६४ |
| विधिरनशम (नैषध ४ ८८) २८२।१३१ | विपिने क्व (राघवविलास) ३६२।१७ | विरहे तव (सा द.१०.६५) २८७।३ |
| विधिरेव (भर्तृ.स ७४७) २२८।२०९ | विपुलकमपि (शिशु ७ ७०) ३३४।१२३ | विरहोऽपि सगम (भर्तृ १ ८०) ३९१।५८५ |
| विधूतकेशा परि (भर्तृ स ७४८) ३३८।७८ | विपुलतरनितम्बा (शिशु ११ ५) ३२३।२३ | विराजतेऽस्या (शा प.३२९५) २५८।४८ |
| विधूता प्रियस्य ३१८।६ | विपुलपुलक (गीत ६ १२ १) २८९।४७ | विराजराजपुत्रा १८७।१४ |
| विधे पिधेहि (शा.प ४९९) १८१।१२ | विपुलमति (मा १३.३३९) ३९१।५६७ | विराटनगरे राज १९३।९ |
| विधोर्विधि २६२।१८६ | विपुलहृदयाभियोग्ये (भोजप्र ९७) ३७।१३ | विराममेवानलया ३०५।१४ |
| विधौ विरुद्धे न ९२।६० | विपुलहृदयैर्धन्यै (भर्तृ सं १६२) ८०।३७ | विरोधिषचसो (शिशु २ २५) ८५।१ |
| विध्वंसपर (वासवदत्ता ९) ५७।१३८ | विपुलेन सागर (शिशु १३ ४०) ३६३।१७ | विलपति तथा (शा प ७८०) २१३।५६ |
| विध्वस्ता मृग (शा प ११५९) २२०।७ | विप्रो वृक्षस्त (वृ चा १० १३) ३९१।५५१ | विलसत्याननं २६२।१६२ |
| विनयं (वृ चाणक्य १२ १८) १५९।२७४ | विप्रार्थेषु धन १६०।३२२ | विलसितमनु (शिशु ७ ४६) ३३४।११० |
| विनयति सुदृशो (शिशु ७.५४) ३३४।१२१ | विप्रियमप्याकर्ण्य ४८।१३० | विलाससद्मगोल्लस (शा प ५८२) २०८।४१ |
| विना कार्येण ये ९६।२ | विप्रेभ्य साधु २४७।४८ | विलासिनी काञ्चन १९०।६६ |
| विना खदिर २४२।१६४ | विबुधावलिसम्पूर्णा १०१।५ | विलासिभिरिवोन्मदै ३३३।९१ |
| विना गोरस १७५।३३६ | भिषज्य मेऽन्नं (नैषध १ १६) १०५।१२९ | विलिखति सदसद्वा ४४।४ |
| विना न साहित्यविद्या (सु १७३) ४०।४१ | विभवो हि यथा ६४।८ | विलिख्य सत्या २२१।१९ |
| विना परीक्षा (दृ श ४३) ४६।६१ | विभिन्नपर्यन्त (किरात ८ ३०) ३३८।७५ | विलीयेन्दु (विद्ध.शा.२ २) २८०।८० |
| विनापि तातेन ३६४।३७ | विभूतिरर्घत्यपि याच (सु ३२५१) ७६।३६ | विल्लुलितकम (शिशु.११.२८) ३२६।२८ |
| विनाप्यर्थैर्वीर स्पृशति (सु ५३५) ७८।१० | विभ्रमैर्विध्वृद्वैस्त्व ३१२।७ | विल्लुलितमतिपूरै २८६।११ |
| विना मयं विना मास(शा प ४०४५) ४५।३ | विभ्रम्य कानन २४४।२२९ | विल्लुलितालकसङ्गति (शिशु ६ ३) ३३२।५९ |
| विना मद्य ३६४।३ | विमुञ्चति पदे १३२।२६ | विलोकयन्तीभिर २५२।८ |
| विनायकपते १८८।३४ | विमुञ्चति बुधो २५२।४९ | विलोकितास्या (नैषध ७ ५१) २६१।१५९ |
| विनायमेनो (काव्याल ३ १५) २०६।१६ | विमुञ्चन्त्या प्राणा (सु १४०३) २८९।६० | विलोकेय (कुमार.१४ ३७) १२८।४० |
| विना यौवन १८८।३३ | वियति विलोलति ३२०।५ | विलोकेय बालामुख १८२।३० |
| विना सायं २६३।१९९ | वियत्पुच्छातुच्छो (शा प.८२) १७।६ | विलोकेय सगमे रागं (सु १८८७) २९३।४ |
| विनिर्गतं मानद ३६५।३ | वियदलिमलिनाम्बु ३०८।८ | विलोचनं दक्षि (कुमार ७ ५९) १२६।३४ |
| विनिश्चेतु (उत्तर रा.१ ३५) ३१३।६२ | वियुक्ता वासन्ती २४०।१२१ | विवर्णवचनैर्मृत्यु (दृ श.७४) १६९।७०५ |
| विनैवाम्भोवाहं (प्र राघव १ ३३) २७१।४२ | वियोगबाष्पा (नैषध ७ ६१) २६०।१२६ | विवक्षतानायिष (कुव ३५) २९७।२१ |
| विन्ध्यमन्दर (शा प १०६४) २१५।३ | वियोगवह्निकुण्डे २८५।१ | विवादप्रारम्भ ८२।४७ |
| विन्ध्याद्रि करि (शा प १२६४) ११६।६३ | विरचिता मधु ३३२।४२ | विवादशीला स्वय १७५।९२१ |
| विपक्ष श्रीकण्ठो (सु २२८०) ५२।२५३ | विरञ्चिनारायण ९१।१२ | विवादो घ्न (शा प.१४६९) १५४।५२ |
| विपक्षचित्तो (किरात ८ ३४) ३३८।७९ | विरमत घना कि (सु १७६२) ३४३।१०४ | विवाहकाले ऋतु १७३।८४६ |
| विपक्ष्मखिली (शिशु २ ३४) १५१।३६१ | विरमत विरमत (सु १०७०) २८४।५ | विवाहे पुरन्ध्रीज १९७।२८ |
| विपत्तौ कि विषा ९१।१४ | विरमति कथनं ३५०।४३ | विविक्तवर्णाम्भर (किरात १४ ३) ८५।१३ |
| विपत्प्रशान्त्यै (शा प.४०९१) ३६७।४ | विरमति महा (अनर्घ १ २) १५।२२ | विविनक्ति न तं (शिशु १६ ३९) ४०।४४ |
| विपत्सिन्धु २८०।८५ | विरम तिमिर (शा प ७६३) २१०।२२ | विवृण्वती पुरस्तैक्ष्यं ५५।६५ |
| विपदि धैर्यमथाम्बु(भर्तृ स १४) ५०।१८८ | विरम नाथ (शृ ति १ ३५) ३१८।७ | विवेक कि (शाति श २.२३) ३७६।२५२ |
| विपदोऽभि (किरात २ १४) १५१।३९२ | विरम रत्न सुधा २१७।५४ | विवेक सह सय (नल च ३ १६) ४६।३७ |
| विपद्यमानता १९४।३९ | विग्म विरभाग्य (भर्तृ स ३२७) ७८।१४ | विवेक एव व्यसनं (दृ श ५) ३७५।२३५ |
| विपन्न पद्मिन्या (शा प ९८१) २३६।१६ | विवेकव्याकोशे (भर्तृ स.३२९) ७७।४७ |