सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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संस्थाननिर्देशमनुक्रमणकोशः
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| सदवनमसदनुशास १५१।३७१ | सन्ततं श्लाघते कस्मै १९९।२० | सन्ध्यां यत्प्रणिपत्य लोक ७।९५ |
| सदसत्त्वेन भावाना युक्ता (सु.२०) ४।१२ | सन्ततमुसलासङ्गा १०४।८२ | सन्ध्याताण्डवचण्डदण्ड २९५।६३ |
| सदसि विदुरभीष्मद्रोण ९३।८१ | सन्ततोदयसृष्ट्येव वद २६१।१४२ | सन्ध्याताण्डवड (वक्ति २ ३१) १०१।४८ |
| सदा खण्डनयोग्याय (सु ३३२) ५५।७८ | सन्तप्तश्रमहारीशीतल १०७।१९० | सन्ध्याताण्डवडम्बरव्यस १०१।५२ |
| सदागतियोच्छ्रायस्तम १९६।१३ | सन्तप्तायसि सस्थि (भर्तृ स ३३) ८७।३३ | सन्ध्यान्तौ नरपुरधितनो ४।३४ |
| सदानुरक्तप्रकृति (शा प १२८८) १४२।५ | सन्तमेव चिर (शिशु १० १५) ३१५।१८ | सन्ध्यारागवती स्वभाव १३।४६ |
| सदा प्रदोषो मम (मृच्छ ५ ३७) ३१२।३८ | सन्तश्च लुब्धाश्च १९७।२३ | सन्ध्यावन्दन भद्र ३७१।१०४ |
| सदा प्रहृष्टया भाव्यं (द श ४०) ३५१।१८ | सन्तश्चेद (शा प १५८२) १७८।१०१४ | सन्ध्यावन्दनवेलाया १९४।१३ |
| सदा मध्ये यासा (का प्र ७ २५६) ३१।४२ | सन्तश्चेदिह गुणबिन्दवो ३९।२४ | सन्ध्यावध्वसशोणं २९५।७१ |
| सदामात्यो न (हि २ १०२) १४७।२१२ | सन्तस्तृणोत्सारण (भोजप्र ४०) ४९।१७३ | सन्ध्यासलिलाञ्जलिमपि ४।१९ |
| सदारिमध्यापि न वैरि १८५।३२ | सन्तापं जगतो विल्ल २१३।७२ | सन्नद्धोऽयं नवतरु २५६।४२ |
| सदा वक्र सदा (सु २३०८) ३६४।१५ | सन्तापमोहकम्पान्नपा ५७।१४७ | सन्ना नाविकधोरणी २४५।१६ |
| सदाईसालस (नल च १ ३६) १०२।२३ | सन्तापय चिर चन्द्र २८५।४६ | सञ्चारीभरणोमा (काव्या ३ ५) १०३।५९ |
| स दीक्षितो य सकल १७५।१९९ | सन्तापिताना मधुरै ७३।३१ | सन्निकर्षोऽत्र १५८।२२२ |
| सदुत्तंस दैवादर्यं १०५।१३२ | सन्ति कूप्रा स्फुर (सु ६८६) २११।१० | सञ्चिग्गुद्य चिकुर ३२।३८ |
| सदूषणापि निर्दो (नल च १.११) ३६।४५ | सन्ति श्वान (अल कौस्तु उ १५) ३२।४ | सन्नियच्छति (मा.५ १३८४) ३८६।३४७ |
| स दोष (मुद्रा रा ३ ३२) १४७।१९२ | सन्ति स्वादुफला (सु ३२३६) ७४।४५ | सन्निहितेऽपि १७१।८०४ |
| सदोषमपि निर्दोष ३८।९ | सन्तु-द्रुमा (सूक्ति ६५ ३) ३३४।११७ | सन्मन्त्रिणा वर्ध १५१।३८२ |
| सद्भावेन ज (काम नी ३ ३३) १६०।३३६ | सन्तु विलोकनभाषण (प्रव ९) २५१।१९ | सन्मार्गे ताव (शा प ३३००) २६०।११२ |
| सद्भि सबोध्यमानो १६५।५४१ | सन्तुष्टे तिस्रूणा (अनर्घ ३ ४१) ३६१।३८ | सद्यस्तभूषाषि २७०।१९ |
| सद्भिरेव सहासीत (शा प १४२२) १५३।३ | सन्तुष्टो भार्यया (म ३ ६०) ३९२।६१९ | सभ्यासमक्रूत (अल कौस्तु अ १) ३२१।१ |
| सद्भिर्भाव्ये हिते काव्ये ३०।५ | सन्तुष्ट्ययुक्तम (वृ श ९१) १६९।७१२ | सपक्षो लभते (शा प १४४९) १५०।३४८ |
| सद्भिस्तु लीलया प्रोक्त ४५।२१ | सन्तोऽपि न विस्रा (वृ ३१६१) ६६।१९ | सपक्षो लभते (शा प १४४९) १५०।३४९ |
| सद्मन्येव निरन्तरं ३४२।७२ | सन्तोऽपि सन्त (शा प २४०) ४९।१६६ | सपदि कुमुदि (शिशु ११ २४) ३२२।१० |
| सद्य करस्पर्शमवा (नवसाहसाङ्क) १२४।५ | सन्तो मनसिकृत्यैव प्रवृ ४६।४४ | सपदि सखीभिर्नि ३३१।१४ |
| सद्य पुरीपरि(बाल रामा ६ ३४) ३६२।२३ | सन्तोषक्षतये पुसा (वृ श ८८) १६९।७११ | स पातु वो यस्य जरा (सु ६३) २२।१२० |
| सद्य प्रबालोद्रमचारु ३३१।२४ | सन्तोषलिप्सु (वृ चा १३ १९) १६०।३३७ | स पुमानर्थवज्ज (किरात ११ ६२) ७९।७ |
| सद्य सघटमानकोक ३२४।५१ | सन्तोषाभृततृप्ता (सूक्ति १२८ ७) ७५।१ | सप्तषष्टि हृता (शा प ३९९६) ३६०।१२ |
| सद्य सान्द्रमषी (शा प ३६०७) २९०।३२ | सन्त्यज्य सर्पवद्दोषा ५४।२८ | सप्तैतानि न (शा प १४५६) १५६।१४८ |
| सद्यश्चन्दनपङ्क ३०२।१०६ | सन्त्यन्येऽपि वृह (भर्तृ स ५३) २४९।९९ | सप्रतिबन्धं कार्यं(मालवि १ ९) १५१।३६७ |
| सद्यो मास (चाणक्य ६५) १६२।३९६ | सन्त्येके धनला (शाप सु ४११०) ३६९।७९ | स बन्धुर्यो विपन्नाना (हि १ ३१) ८८।६ |
| सद्रत्नस्फारहाराभय २५२।५९ | सन्त्येकेऽपि महीरुहा २३८।७१ | सभयचकितं (गीत ५ ११ ६) ३०८।१० |
| सद्रंशजस्य परिताप (सु ३०८) ५०।२०७ | सन्त्येव प्रतिमन्दिर युव ३५६।७ | सभाकल्पतरुं वन्दे १०१।१ |
| सद्वंशजात गुणकोटि ६०।२३० | सन्त्येव लिखिताकाशा २३७।४० | सभा वा न (शा प १३४५) १४६।१५० |
| सद्वंशतवादङ्ग (शिशु १८ १९) १२९।६४ | सन्त्येवात्र गृहे (अमरु ९२) ३०७।५५ | सभूभृङ्ग करकिस २५६।४४ |
| सद्वंशसंभव (सा द ६ १७७) १५०।३५३ | सन्दधीत (मा १२ २७०५) १५०।३३९ | समं विलासो (शा प ३२७६) २५५।१८ |
| सद्विद्या यदि का चिन्ता (शा प ४७३) ३०।९ | सन्दर्शयन्खमधुवैभव २४३।२०४ | समदनमवतं (शिशु ७ ५९) ३३४।१२५ |
| सद्वृत्तसद्गुण (शा प ११७३) २४६।२६ | सन्दष्टवस्त्रेष्वबला (सु १८७२) ३३८।६६ | समदमत्तग (का प्र १० ४९१) १०३।७७ |
| सद्भेदिमद्योत्थमहेमकुम्भ १०९।९ | सन्दष्ट्राधरपल्लवा (अमरु ३६) ३१७।५ | समदशिखि (किरात १० २५) ३४०।२७ |
| स धूर्जटिजटाजूटो (शा प १०१) ९।१२० | सन्दानान्ताद (शिशु १८ ७१) ३०१।९०० | समान्तदाक्रान्तादव २२६।१७४ |
| सन्त कापि न सन्ति ९९।२६ | सन्दिग्धे परलोके(पच १ १९६) ३५२।१५ | समभिसृत्य (शिशु ६ १०) ३३२।६५ |
| सन्त सच्च (दश रू ३ १८) ३८०।१२७ | सन्देहो वैष्णवे मार्गे १६६।६०७ | समय एव करोति (शिशु ६ ४४) ३४४।३२ |
| सन्त स्वत प्रका-न्ते ४५।२९ | सन्धिविग्रहया (सु २४६६) १५०।३१८ | समयज्ञानर्थवत. (शिशु ६ ४४) ३४९।४३ |
| सन्त एव सता नि (हि १ १९३) ४६।४६ | सन्ध्या कोषं तत उप - २७६।४५ | समयमिह वदन्ति कं २०१।६६ |
| समयशबरो व्योमा ३०४।१५९ |