सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
पृष्ठ 507, कुल 516 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 507
| ७६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| स एव धन्यो विपदि ७७।१ | सङ्ग्रह नाकुली(नल च ४ २०) १४२।२८ | सति शीले गुणा (दृ श १४) ८४।६ |
| स एव रसिको लोके ३८।१५ | सङ्ग्रामक्षोणिदप्य ११८।१०७ | सतीमपि ज्ञा(अ शाकु ५ १७) १७४।९०१ |
| स कथं न (शा प ३३५३) २६८।३७६ | सङ्ग्रामाङ्गणमाग (सु २५१३) १०८।१९७ | सत्कविरसनास्फूर्ती निस्तुष ३१।२३ |
| सकळभुवनबन्धोर्वैर (शा प १२१) १५।२० | सङ्ग्रामाङ्गणमागते (सदुक्ति क ) २४५।८ | सत्कृता लालिता (भाव २०) ३९३।६३२ |
| सकलापि कला १७५।९३७ | सङ्ग्रामाानन्दवर्धिष्णौ १२७।३ | सत्कोणं लोलनेत्रं (शा प ४०३९) ४४।९ |
| स किसखा साधु (किरात १ ५) १५२।३९५ | सङ्ग्रामे रिपुभुभुजा १८३।५२ | सत्क्षेत्रप्रति (सु.३०२८) ३७९।७९ |
| स किमु सहेत सुधांशु २१९।१० | सङ्ग्रामे सुभटे (भोजप्र.१५१) १५८।२३० | सत्पक्षा ऋजव शुद्धा (सु २२९) ४७।७९ |
| सकृज्जल्पन्ति (वे १४) ३७७।१८ | सङ्ग्रामे स्फुरदसिना २०१।७५ | सत्पात्रोपनयोचितसत्प्र ३०।२० |
| सकृत्कन्दुकपातेनो (पच २ १६८)४५।३१ | सङ्ग्रामो दिवसाायते १९९।१३६ | सत्पादपान्विपुल (शा प ११५३) २२०।२ |
| सकृदपि दृष्ट्वा (सु.२४०) १७१।७८३ | सच्छिद्रे निकटे १६७।६३२ | सत्पूरुष खलु हिता ५०।१९७ |
| सकृदिव समर्प्य बाले ३०५।७ | सच्छिद्रो मध्यकुटिल. (सु ४४७) ९०।४ | सत्यं गुणा गुणवत्ता ५०।२०९ |
| सकृद्दुष्टगृहीता (चाणक्य १०४) १४४।७५ | स च्छिन्मूलम् १३८।२९ | सत्यं जना (भर्तृ १ ५४) ३८५।३४२ |
| सकृद्दुष्टं च मित्रं(चाणक्य १९) १६१।३४५ | स जयति चित्रचरित्रो १८९।५३ | सत्यं तयदवोचथा मम ३१०।१० |
| सत्सूक्ष्मोषयति द्रुता (सु ३२०१) ६८।८५ | स जयति महावराहो १८।२६ | सत्यं तप सुगत्यै (कुव ९३) ३१२।२९ |
| स क्षत्रियस्त्राण (किरात ३ ४८) १५१।३७६ | स जयति हिमकरले (वासवद ४) ४।१५ | सत्य तपो ज्ञानमहिंसता ३९।१९ |
| स क्षारो जल (सूक्ति १३ १०) २१४।८३ | स जयी वरमा (भोजप्र ५९) १४७।१९९ | सत्यं त्वं पुरुषोत्तमो १२५।१६ |
| सखि दयित (किरात १० ४७) २८८।३६ | सजलजलधर (किरात १० १९) ३४०।२१ | सत्यं दुर्लभ एष (शृङ्गारति २ ८) ३११।१८ |
| सखि दशनक्षतमधरे ३२८।४ | स जात कोऽप्या (भर्तृ स ३३८) ८०।३६ | सत्य म (व्यास औचित्य १८) ३७२।१६० |
| सखि पतिविरहदहुताश २८५।३ | स जातो येन जातेन (हि प्र १४) ९८।७ | सत्य वक्तुमशेष(शांति श ४ ५)३९०।५२७ |
| सखि स विजितो ३५९।९८ | स जीव (वृ चाणक्य १४ १३) १५९।२५६ | सत्य शौर्यं दया (हि ३ १२९)१४८।२४० |
| सखि साहजिक ८८।१ | स जीवति यशो यस्य (नीतिसार ७) ९८।४ | सत्य सत्यं मुने (शा प ८५५) १६६।५७२ |
| सखि सुखलयव ३५२।१० | सज्जन एव हि विद्या ४७।१०१ | सत्यं सन्ति गृहे गृहे(शृ ति १ ७) ३४।५७ |
| सखि हे पश्य रस ३४३।९८ | सज्जनसङ्गो मा भूयदि ८७।२० | सत्य सा बहुरूपिणी १२०।१३८ |
| सखीभिक्षा (शा प ३४८५) २८९।५९ | सज्जनस्य हृदयं नवनीतं ४९।१६२ | सत्यधर्मच्युतात्पुंस (सु ३६६) ५६।९८ |
| सखे खेदं मा गा (सु ३१९१) ६७।६० | सज्जना एव साधूना (नीतिसार ७) ४६।५६ | सत्यपि च सुकृत (भोजप्र २६) १७१।७८७ |
| सखे साय ज्ञात्वा २७३।१७ | सज्जन्ता कुम्भभित्ति १२७।२४ | सत्यप्रशमतपोभि स (शा प ४३२) ६९।९ |
| सगुणापि हन्त ५८।१५८ | सज्जमानम (का नी ४ ४५) ३९०।५२४ | सत्यभामासमाश्लिष्ट १०२।२९ |
| सगुणै सेवितोषा (शा प ११४८) २२०।४ | सज्जितसकलशरीरा (सु ३५२६) ३०४।३ | सत्यमेव गदितं त्वया ३५६।११ |
| सङ्कटे न च गन्तव्यं १६७।६५२ | सज्जितानि सुरभी (शिशु १० १) ३१४।४ | सत्यमेव (महानिर्वाण तन्त्र २१) ३८६।३४४ |
| सङ्केतकुञ्जभुवि सा २८८।४२ | सञ्चये च (मा १२ ३८९१) ३९०।५३१ | सत्यशील (विदग्ध मुख ४ ७०) १९६।१२ |
| सङ्केतकेलिगृहेमत्त्य ३५८।७१ | सञ्चरन्ति मृगनाभि २९८।१३ | सत्यशात्र (रा २ ३५ २८) ३८१।१८४ |
| सङ्घिष्येत क्षण (मेघ २.४५) २९२।२७ | सञ्चारो रतिमन्दिरा ३५१।४० | सत्या क्षितौ (भाग २ २ ४) ३८४।३०७ |
| सङ्गेपात् कथ्यते ३७७।१३ | सञ्चित क्रतुषु नोप (सु ४८७) ७२।४९ | सत्यानुसारिणी लक्ष्मी १५७।१७८ |
| सङ्गोभं पयसि (शिशु ८ १८) ३३८।१०० | सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य(भोजप्र ९०)१७४।८९४ | सत्यानृता च परु (हि २ १८४)१५२।४०४ |
| सङ्गह्येया न भवन्ति २१६।२८ | सज्जग्माते तावपा (शिशु १८ १) १२९।५२ | सत्यासक्तमना गुणा ११८।१०८ |
| सङ्गं त्यजेत (शौनकी ३०) ३८९।४८७ | सञ्जहार सहसा प(शिशु १० ४४)३१६।४ | सत्यासक्तमना प्रबुद्ध १९२।८८ |
| सङ्ग नैव हि कश्चि (मृच्छ १ ३७) ६८।७४ | सञ्जातपन्नप्रकरान्विता (कुव ४५) ३३५।६ | सत्येन धार्यते (वृ चा ५ १८) १५१।२९० |
| सङ्ग सत्सु (साधन पचक २) ३९१।५८४ | सञ्जातसान्द्रमकरन्दरसा ९२।७१ | सत्त्वादिस्तैरगणितगुणै १२।२५ |
| सङ्ग सर्वात्मना (हि ४ ९०) ८७।१७ | सञ्जाते द्रवरूपता ११८।१०५ | सत्सङ्गाद्भवति हि (वृ चा १२ ७) ८७।२७ |
| सङ्गतानि मृगा(काव्या २ ३३२)३४९।३६ | सता मतमति(मा ३ ४१४७) ३९०।५३३ | सत्साङ्गत्यमवाप्य य २२७।१९८ |
| सङ्गताभिरुचितैश्च(शिशु १०.८१)३२९।७ | सता समालोकयता २६५।२८३ | सत्साधुवादे मूर्खस्य (सु ३३६) ५६।८२ |
| सङ्गति खविपरीत ८८।११ | सति काकुत्स्थकुलोन्नति ३६।५१ | सत्सूत्रस्रविधानं सद ३०।२१ |
| सङ्गमविरह २७७।१९ | सति द्राक्षाफले क्षीरे ७१।२० | सद्महारैर्रभवता ११८।१०४ |
| सङ्गीतमपि साहित्य २९।८ | सति प्रदीपे सत्यग्नौ(भर्तृ स १३०) २७७।९ | सद्दम्भोजाम्भोजं परि २२३।९३ |
| सद्य हृदयं यस्य १५७।१९२ |