सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित (मूल पाठ) (दोहा) श्रीगनेस सुमिर करौं, उपजै बुद्धि प्रकास । सो चरित्र वरनन करी, जातैं दारिद नास ॥१॥ ज्यों गंगा-जल-पान तें, पावत पद निरवान । त्यों सिंधुर-मुख-वात तें, मूढ़ होत बुधिवान ॥२॥ कृस्न-मित्र कइ जन्म को, ताको वरनन कीन्ह । सुख संपति माया मिलै, सो उपदेश जु दीन्ह ॥३॥ बिप्र सुदामा बसत हो, सदा आपने धाम । भीख माँगि भोजन करैं, हिये जपत हरि-नाम ॥४॥ ताकी घरनी पतिब्रता, गहे वेद की रीति । सलज सुसील सुबुद्धि अति, पति-सेवा सौं प्रीति ॥५॥ कह्यौ सुदामा एक दिन, ‘कृस्न हमारे मित्र’ । करत रहति उपदेश तिय, ऐसो परम-विचित्र ॥६॥ स्त्री महादानि जिनके हितू, जदु-कुल-कैरव-चंद । ते दारिद-संताप तें, रहैं न किमि निरद्वंद ॥७॥ कह्यौ सुदामा ‘बाम ! सुने, वृथा और सब भोग । सत्यभजन भगवान को, धर्म-सहित जप-जोग’ ॥८॥