भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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४० / सुदामा-चरित स्त्री (कवित्त) लोचन-कमल दुख-मोचन तिलक भाल, स्रवननि कुंडल मुकुट धरे माथ हैं ओढ़े पीत-बसन गरे मैं बैजयन्ती-माल, संख चक्र गदा और पदम लिए हाथ हैं । कहत नरोत्तम संदीपनि गुरू के पास, तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं । द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय, द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं ॥६॥ (सवैया) सुदामा सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय, ताको कहा, अब देति है सिच्छा । जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिन नहिं इच्छा ॥ मेरे हिते हरि के पद-पंकज, वार हजार लै देखु परिच्छा । औरन को धन चाहिय बावरि, बांभन को धन केवल भिच्छा ॥१०॥ स्त्री दानी बड़े तिहुँ लोकन में, जग जीवत नाम सदा जिनको लै । दीनन की सुधि लेत भली विधि, सिद्धि करौ पिय मेरो मतो लै ॥ दीनदयाल के द्वार न जात सो, और के द्वार पै दीन ह्वै बोलै । श्रीजदुनाथ-से जाके हितू, सो तिहूं पन क्यों कन माँगत डोलै ॥११॥ सुदामा छत्रिन के प्रन जुद्ध, जुवा, सजि वाजि, चढ़ें गजराजन ही । बैस को बानिज और कृषि, प्रन सूद्र को सेवन-साजन ही ॥